Vibhuvana Sankashti Chaturthi: विभुवन संकष्टी चतुर्थी तीनों लोकों में व्याप्त भगवान गणेश के दिव्य स्वरूप की आराधना का विशेष पर्व माना जाता है। इस दिन व्रत, पूजा और कथा श्रवण करने से भक्तों के जीवन के संकट दूर होते हैं तथा सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
विभुवन संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक महत्व
हिंदू धर्म में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और सिद्धि-बुद्धि के दाता के रूप में पूजा जाता है। प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है, जिसे संकटों को दूर करने वाला माना गया है।
जब यह चतुर्थी अधिक मास में आती है, तब इसे विभुवन संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। अधिक मास स्वयं में अत्यंत पवित्र माना गया है और इस दौरान किए गए शुभ कार्यों का फल कई गुना बढ़ जाता है। इसी कारण इस व्रत का महत्व भी विशेष रूप से बढ़ जाता है।
मान्यता है कि इस दिन भगवान गणेश के विभुवन स्वरूप की पूजा करने से जीवन की बाधाएं, आर्थिक परेशानियां, रोग और मानसिक कष्ट दूर होते हैं। नारद पुराण सहित कई पुराणों में इस व्रत की महिमा का वर्णन मिलता है।
विभुवन संकष्टी चतुर्थी की पौराणिक कथा
नारद पुराण के अनुसार, पांडव जब वनवास के कठिन समय से गुजर रहे थे, तब वे अनेक दुखों और संकटों से घिरे हुए थे। द्रौपदी सहित पांचों पांडव जंगलों में जीवन बिताने को विवश थे।
एक दिन उन्होंने महर्षि वेदव्यास से अपने दुखों से मुक्ति का उपाय पूछा। तब वेदव्यास जी ने उन्हें अधिक मास में आने वाली विभुवन संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि यह व्रत भगवान गणेश को अत्यंत प्रिय है और इसे श्रद्धा से करने पर सभी संकट दूर हो जाते हैं।
महर्षि के निर्देशानुसार पांडवों ने द्रौपदी सहित यह व्रत किया। भगवान गणेश की कृपा से उनके जीवन के कष्ट समाप्त होने लगे और आगे चलकर उन्हें अपना राज्य पुनः प्राप्त हुआ। यह कथा इस व्रत की महिमा को दर्शाती है।
शिव-पार्वती से जुड़ी कथा
विभुवन संकष्टी चतुर्थी से जुड़ी एक अन्य कथा शिव पुराण में वर्णित है। कहा जाता है कि एक बार भगवान शिव और माता पार्वती चौपड़ खेल रहे थे। खेल में माता पार्वती ने शिवजी की सभी वस्तुएं जीत लीं।
जब शिवजी ने अपना गजचर्म वापस मांगा और पार्वतीजी ने ध्यान नहीं दिया, तब महादेव क्रोधित होकर बोले कि वे 29 दिनों तक उनसे बात नहीं करेंगे। इसके बाद वे वहां से चले गए।
भगवान शिव को खोजते हुए माता पार्वती एक वन में पहुंचीं, जहां कुछ स्त्रियां विभुवन संकष्टी चतुर्थी का व्रत कर रही थीं। उन्होंने भी उसी विधि से व्रत और पूजा आरंभ की।
व्रत के प्रभाव से भगवान शिव स्वयं वहां प्रकट हो गए और पार्वतीजी से प्रसन्न होकर बोले कि इस व्रत की महिमा अत्यंत अद्भुत है। इसके बाद यह व्रत देवताओं और राजाओं के माध्यम से संसार में प्रसिद्ध हुआ।
राजा विक्रमादित्य और रानी की कथा
कथा के अनुसार, राजा विक्रमादित्य ने यह व्रत अपनी रानी को बताया, लेकिन रानी ने इसका उपहास किया। परिणामस्वरूप वह गंभीर रोग से पीड़ित हो गई।
बाद में ऋषियों के कहने पर रानी ने भगवान गणेश का व्रत और पूजन आरंभ किया। एक माह तक श्रद्धा से व्रत करने के बाद वह पूर्णतः स्वस्थ हो गई। इससे यह संदेश मिलता है कि भगवान गणेश की भक्ति से रोग, दुख और दरिद्रता दूर हो सकती है।
पूजा और व्रत का विधान
विभुवन संकष्टी चतुर्थी के दिन प्रातः स्नान करके भगवान गणेश की पूजा की जाती है। पूजा में मोदक, तिल के लड्डू, दूर्वा, लाल फूल, सिंदूर और चंदन अर्पित किए जाते हैं।
भक्त पूरे दिन व्रत रखते हैं और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करते हैं। इस दिन “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का जाप तथा गणेश कथा का श्रवण विशेष फलदायी माना गया है।
व्रत से मिलने वाले लाभ
जीवन के संकट और बाधाएं दूर होती हैं
आर्थिक परेशानियों से राहत मिलती है
रोग और मानसिक तनाव कम होते हैं
परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है
भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है
विभुवन संकष्टी चतुर्थी का व्रत श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।