सितंबर में नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping के शामिल होने की संभावना के बीच भारत और चीन के संबंधों में नई कूटनीतिक गतिविधियां देखने को मिल रही हैं। पूर्वी लद्दाख में 2020 से 2024 तक चले सैन्य गतिरोध के बाद दोनों देश अब रिश्तों को सामान्य बनाने की दिशा में कदम बढ़ाते नजर आ रहे हैं।
डोभाल-वांग यी वार्ता से मिले सकारात्मक संकेत
हाल ही में नई दिल्ली में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार Ajit Doval और चीन के विदेश मंत्री Wang Yi के बीच हुई बातचीत ने संकेत दिया है कि दोनों देश सीमा विवाद के अपेक्षाकृत कम संवेदनशील क्षेत्रों में शुरुआती समाधान तलाशने पर विचार कर सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह वार्ता दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।
क्या है ‘अर्ली हार्वेस्ट’ मॉडल?
चीन ने सीमा विवाद के कम विवादित क्षेत्रों, खासकर सिक्किम सेक्टर में प्रारंभिक समझौते का प्रस्ताव रखा है। इसे सीमा निर्धारण प्रक्रिया में “अर्ली हार्वेस्ट” दृष्टिकोण कहा जा रहा है।
अब तक भारत का रुख यह रहा है कि सीमा विवाद का समाधान चरणबद्ध नहीं बल्कि समग्र और अंतिम होना चाहिए। हालांकि बदलते भू-राजनीतिक माहौल में नई दिल्ली अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाती दिखाई दे रही है।
मोदी-वांग यी मुलाकात ने बढ़ाई उम्मीदें
ब्रिक्स से जुड़े कार्यक्रमों के दौरान प्रधानमंत्री Narendra Modi और वांग यी की मुलाकात ने भी दोनों देशों के बीच संवाद को नई गति दी है।
चीन ने कहा है कि वह भारत के साथ आपसी विश्वास बढ़ाने, गलतफहमियां दूर करने और संवेदनशील मुद्दों को सावधानीपूर्वक संभालने के लिए तैयार है। वहीं भारत लगातार यह दोहराता रहा है कि सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता के बिना द्विपक्षीय संबंध सामान्य नहीं हो सकते।
सीमा प्रबंधन के लिए नई व्यवस्था पर चर्चा
दोनों देशों के बीच सीमा क्षेत्रों में तनाव कम करने और आकस्मिक सैन्य टकराव रोकने के लिए नई कार्य प्रणाली विकसित करने पर भी चर्चा चल रही है।
इसके अलावा भारत ने सीमा पार नदियों से जुड़े मुद्दों पर विशेषज्ञ स्तर की वार्ता जल्द शुरू करने की मांग रखी है। जल सुरक्षा और पर्यावरण के लिहाज से यह विषय भविष्य में और अधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
बदलती विदेश नीति का संकेत
भारत की मौजूदा रणनीति यह संकेत देती है कि नई दिल्ली अब प्रतिस्पर्धा और सहयोग दोनों को साथ लेकर चलने की नीति अपना रही है।
एक ओर भारत अमेरिका, जापान और यूरोपीय देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर चीन के साथ आर्थिक और कूटनीतिक संपर्क बनाए रखने का प्रयास भी जारी है।
जापान और दक्षिण कोरिया से सीखने की चर्चा
अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के मॉडल से सीख सकता है।
जापान का मॉडल
Japan अमेरिका का प्रमुख सुरक्षा साझेदार है, लेकिन चीन के साथ उसके आर्थिक संबंध मजबूत बने हुए हैं। राजनीतिक और समुद्री विवादों के बावजूद टोक्यो ने आर्थिक संपर्क जारी रखा है।
दक्षिण कोरिया का संतुलन
South Korea भी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर है, लेकिन उसकी अर्थव्यवस्था चीन के विशाल बाजार से जुड़ी हुई है। कई तनावपूर्ण दौर आने के बावजूद उसने संवाद और व्यापारिक संबंध बनाए रखे।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है संतुलन?
भारत तेजी से वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे में चीन के साथ पूर्ण टकराव की नीति आर्थिक हितों को प्रभावित कर सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए सबसे उपयुक्त रणनीति वही होगी जिसमें सुरक्षा हितों की रक्षा करते हुए आर्थिक अवसरों का भी लाभ उठाया जाए।
आगे की राह
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद, रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और आपसी अविश्वास जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। इसके बावजूद हालिया कूटनीतिक गतिविधियां यह संकेत देती हैं कि दोनों देश टकराव की बजाय नियंत्रित प्रतिस्पर्धा और निरंतर संवाद के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहते हैं।
यदि यह प्रक्रिया सफल रहती है, तो इससे न केवल एशिया में स्थिरता बढ़ेगी, बल्कि भारत को अपनी सामरिक स्वायत्तता, आर्थिक विकास और वैश्विक प्रभाव को और मजबूत करने का अवसर भी मिलेगा।