विश्वामित्र ने विचार किया कि लाख प्रयत्न करके भी मैं तपस्या में सफल नहीं हो पा रहा हूँ। माया कब प्रवेश करती है मुझे पता ही नहीं चलता। जब आकाशवाणी सूचित करती है तब ज्ञात हो पाता है। लगता है कि मैं अपने बल से इन बाधाओं पर विजय नहीं प्राप्त कर सकता। अन्तत: विश्वामित्र ने परमात्मा की शरण ली कि– ‘‘ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।’’ (यजुर्वेद, अध्याय ३६, कण्डिका ३) अर्थात् ॐ शब्द से उच्चरित, भू:, भुव: और स्व: तीनों लोकों में तत्त्वरूप से व्याप्त ‘सवितु:’– ज्योतिर्मय परमात्मा! आपके ‘वरेण्य भर्ग’ अर्थात् तेज का हम ‘धीमहि’- ध्यान करते हैं। ‘न: धिय: प्रचोदयात्’– हमारी बुद्धि में निवास करें, मुझे प्रेरणा दें।
इस प्रकार अपने को भगवान के प्रति सर्मिपत कर विश्वामित्र तपस्या में लग गये। माया विश्वामित्र के पास आई, उनकी परिक्रमा कर लौट गयी। ब्रह्मा आये और कहा– आज से आप ऋषि हुए, मर्हिष हुए; किन्तु विश्वामित्र ने कहा– हमें जितेन्द्रिय ब्रह्र्मिष कहें। ब्रह्मा ने कहा– अभी आप जितेन्द्रिय नहीं हैं।
विश्वामित्र तपस्या में लगे ही रह गये। विधाता तीसरी बार समस्त देवताओं सहित पहुँचे और कहा– आज से आप ब्रह्मर्षि हुए। विश्वामित्र ने कहा– यदि मैं ब्रह्मर्षि हूँ तो वेद मेरा वरण करें। विश्वामित्र के पास वेद आ गये। जो परमात्मा अविदित था, वह विदित हो गया। वेदों का अध्ययन नहीं करना पड़ता, बल्कि प्राप्ति के साथ मिलनेवाली प्रत्यक्ष अनुभूति का नाम वेद है। वेद का अर्थ है जानकारी, परमात्मा जानने में आ गया।
विश्वामित्र ने कहा– वशिष्ठ दर्शन दें। वशिष्ठ आये, विश्वामित्र से गले मिले।
इस प्रकार गायत्री एक परमात्मा के प्रति समर्पण है। इसके द्वारा हम-आप त्रिगुणमयी प्रकृति का पार पा सकते हैं कि भू: भुव: स्व: तीनों लोकों में तत्त्वरूप से जो व्याप्त है, जो सहज प्रकाशस्वरूप है, हे परमात्मा! आप मेरी बुद्धि में निवास करें जिससे मैं आपको जान लूँ। यह प्रार्थना गीता के अनुरूप है कि ‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।’ (१८/६६)– सारे धर्मों को त्याग दे, मात्र मेरी शरण हो जा। मैं तुम्हें सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा। तू मुझे प्राप्त होगा। सदा रहने वाला जीवन और शान्ति प्राप्त कर लेगा। यही है गायत्री!