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पंजाब केसरी बनाम मान सरकार: गंभीर आरोप

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पंजाब की राजनीति में उस समय नया मोड़ आ गया, जब प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान पंजाब केसरी अखबार समूह ने मुख्यमंत्री भगवंत मान को पत्र लिखकर राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। समूह का कहना है कि सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (AAP) के खिलाफ निष्पक्ष खबरें प्रकाशित करने के कारण उसे सरकारी एजेंसियों के जरिए निशाना बनाया जा रहा है।

“प्रेस को डराने” का आरोप

पंजाब केसरी समूह के विजय कुमार चोपड़ा, अविनाश चोपड़ा और अमित चोपड़ा द्वारा हस्ताक्षरित पत्र में आरोप लगाया गया है कि हाल ही में प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा की गई छापेमारियों की श्रृंखला का उद्देश्य प्रेस को डराना है।
समूह का दावा है कि यह उत्पीड़न तब शुरू हुआ, जब अखबार ने ‘आप’ के राष्ट्रीय संयोजक के खिलाफ विपक्ष के आरोपों पर एक संतुलित और निष्पक्ष रिपोर्ट प्रकाशित की।

मुख्यमंत्री से जांच की मांग

पत्र में मुख्यमंत्री भगवंत मान से अपील की गई है कि वे इस पूरे मामले की तत्काल जांच कराएं और मीडिया की स्वतंत्रता सुनिश्चित करें।

सरकार का पलटवार, आरोप खारिज

पंजाब सरकार ने देर शाम जारी एक आधिकारिक बयान में पंजाब केसरी समूह के सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया।
वहीं, भाजपा, कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल (शिअद) सहित विपक्षी दलों ने आम आदमी पार्टी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वह सत्ता की ताकत से मीडिया की आवाज दबा रही है। भाजपा ने कहा कि उसका एक प्रतिनिधिमंडल राज्यपाल से मुलाकात कर यह मुद्दा उठाएगा।

पत्र में क्या कहा गया?

पत्र की शुरुआत में कहा गया,“हम हाल के कुछ घटनाक्रमों को लेकर गहरी चिंता और पीड़ा व्यक्त कर रहे हैं, जिनसे यह आशंका उत्पन्न होती है कि पंजाब सरकार किसी बाहरी मकसद से पंजाब केसरी समूह को विशेष रूप से निशाना बना रही है।”

मुख्यमंत्री से इस मामले में जल्द से जल्द आवश्यक कार्रवाई करने का अनुरोध किया गया है।

31 अक्टूबर 2025 से शुरू हुआ विवाद

पत्र के अनुसार, घटनाक्रम की शुरुआत 31 अक्टूबर 2025 को प्रकाशित एक समाचार से हुई, जो सत्तारूढ़ दल के राष्ट्रीय संयोजक पर विपक्ष के आरोपों को लेकर एक निष्पक्ष रिपोर्ट थी।
इसके बाद 2 नवंबर 2025 से पंजाब सरकार ने पंजाब केसरी समूह को दिए जाने वाले सभी सरकारी विज्ञापनों पर रोक लगा दी।

आर्थिक दबाव और छापेमारियों का सिलसिला

समूह ने आरोप लगाया कि विज्ञापन रोकने के बावजूद उसने स्वतंत्र पत्रकारिता जारी रखी, लेकिन इसके बाद लगातार छापेमारियां की गईं। इनमें शामिल हैं—

11 जनवरी: जालंधर स्थित पार्क प्लाजा होटल में एफएसएसएआई की छापेमारी

12 जनवरी:

जालंधर होटल पर जीएसटी विभाग की छापेमारी

आबकारी विभाग की कार्रवाई

लुधियाना स्थित पंजाब केसरी प्रिंटिंग प्रेस पर कारखाना विभाग का छापा

13 जनवरी:

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की छापेमारी

आबकारी विभाग का कारण बताओ नोटिस

14 जनवरी:

होटल का लाइसेंस रद्द

एक होटल का बिजली कनेक्शन काटा गया

15 जनवरी:

लुधियाना और जालंधर स्थित प्रिंटिंग प्रेस पर फिर कार्रवाई

कामकाज ठप होने की आशंका

पत्र में दावा किया गया कि इन कार्रवाइयों के कारण जालंधर, लुधियाना और बठिंडा स्थित प्रेसों का कामकाज बाधित या पूरी तरह बंद होने की स्थिति बन गई है।
साथ ही, सुरानुस्सी, फोकल प्वाइंट (लुधियाना) और आईजीसी बठिंडा स्थित प्रेस के बाहर भारी पुलिस बल तैनात किया गया।

विरासत और बलिदान का हवाला

पंजाब केसरी समूह ने मुख्यमंत्री को याद दिलाया कि लाला जगत नारायण ने 1949 में हिंद समाचार की स्थापना की थी और 1965 में पंजाब केसरी का प्रकाशन शुरू हुआ।
समूह ने कहा कि उग्रवाद के दौर में निडर पत्रकारिता के कारण लाला जगत नारायण, रमेश चंद्र चोपड़ा सहित 60 से अधिक लोग शहीद हुए, फिर भी अखबार ने कभी सच लिखना बंद नहीं किया।

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की रक्षा की अपील

पत्र में कहा गया है कि विभिन्न विभागों द्वारा पूर्वनियोजित इरादे से की जा रही कार्रवाइयां डराने-धमकाने का संकेत देती हैं।
समूह ने उम्मीद जताई कि मुख्यमंत्री का कार्यालय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया की स्वतंत्रता की रक्षा करेगा।

चुनाव से पहले लोकतंत्र पर खतरे की चेतावनी

पत्र में चेतावनी दी गई है कि प्रेस की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप, खासकर चुनाव से पहले, पंजाब के लोकतंत्र को कमजोर करेगा।

पंजाब सरकार का विस्तृत जवाब

सरकार ने “लक्षित हमले” के आरोप को खारिज करते हुए कहा कि यह गंभीर वैधानिक उल्लंघनों से ध्यान भटकाने की कोशिश है।
सरकार के अनुसार, सभी कार्रवाइयां कानून के दायरे में और ठोस सबूतों के आधार पर की गई हैं।

कानून से ऊपर कोई नहीं: सरकार

पंजाब सरकार ने स्पष्ट किया कि—

आबकारी, श्रम, सुरक्षा और पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन सामने आया

प्रेस की स्वतंत्रता का मतलब कानून से ऊपर होना नहीं

कानून सभी पर समान रूप से लागू होते हैं

सरकार ने दोहराया कि संपादकीय स्वतंत्रता सुरक्षित रहेगी, लेकिन जनस्वास्थ्य, श्रमिकों और पर्यावरण से जुड़े उल्लंघनों को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा।

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