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नेपाल पहुंचे भारतीय सेना प्रमुख धीरज सेठ, चीन की बढ़ी चिंता

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हिमालयी क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच भारतीय सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ की नेपाल यात्रा को भारत-नेपाल सैन्य संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। काठमांडू में उनकी यात्रा दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे सैन्य और संस्थागत संबंधों को रेखांकित करती है।

नेपाली सेना मुख्यालय में गार्ड ऑफ ऑनर, टुंडीखेल में पुष्पांजलि और शीर्ष सैन्य अधिकारियों के साथ बातचीत इस यात्रा के प्रमुख कार्यक्रम रहे। हालांकि इसे सीधे किसी सैन्य गठबंधन के रूप में देखना उचित नहीं होगा, लेकिन यह भारत और नेपाल के बीच मजबूत सैन्य संपर्क को जरूर दर्शाता है।

18 और 19 अगस्त को भी कई कार्यक्रम

18 अगस्त को जनरल धीरज सेठ शिवपुरी स्थित आर्मी कमांड एंड स्टाफ कोर्स के प्रशिक्षु अधिकारियों को संबोधित करेंगे। वह प्रशिक्षकों और विदेशी अधिकारी-प्रशिक्षुओं के साथ भी संवाद करेंगे।

इसके अलावा नेपाली वरिष्ठ नेताओं के साथ द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत की जाएगी। 19 अगस्त को पोखरा में पूर्व सैनिक रैली में शामिल होकर वह वीर नारियों और वीरता पुरस्कार विजेताओं को सम्मानित करेंगे तथा भारतीय सेना के पूर्व सैनिकों से मुलाकात करेंगे।

इससे स्पष्ट है कि यात्रा केवल शीर्ष सैन्य नेतृत्व तक सीमित नहीं है, बल्कि सैन्य शिक्षा, पूर्व सैनिकों और संस्थागत संपर्कों तक भी इसका विस्तार है।

चीन के लिए क्यों महत्वपूर्ण है भारत-नेपाल संबंध?

नेपाल भारत और चीन के बीच स्थित एक महत्वपूर्ण हिमालयी देश है। काठमांडू की विदेश नीति लंबे समय से संतुलन साधने और सभी प्रमुख देशों के साथ संबंध बनाए रखने पर केंद्रित रही है।

इसके बावजूद भारत और नेपाल के संबंध अपनी भौगोलिक निकटता, खुली सीमा, सामाजिक-सांस्कृतिक रिश्तों और सैन्य संपर्कों के कारण विशेष महत्व रखते हैं।

भारत के लिए नेपाल के साथ मजबूत सैन्य संबंध हिमालयी सुरक्षा, सीमा प्रबंधन, आपदा राहत, आतंकवाद-रोधी सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता के लिहाज से अहम हैं। दूसरी ओर, नेपाल में भारत की मजबूत संस्थागत मौजूदगी चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कारक बनती है।

गोरखा सैनिकों से जुड़े हैं रिश्ते

भारत और नेपाल के सैन्य संबंधों की जड़ें काफी पुरानी हैं। गोरखा सैनिकों की परंपरा ने दोनों देशों की सेनाओं के बीच विशेष संबंध विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद भी नेपाली गोरखा सैनिक भारतीय सेना में अपनी सेवाएं देते रहे। समय के साथ इन संबंधों ने सैन्य सहयोग के साथ-साथ पेशेवर और पारिवारिक जुड़ाव का भी रूप लिया।

नेपाली सेना के आधुनिकीकरण में भारत की भूमिका

भारत और नेपाल के बीच सैन्य सहयोग केवल सैनिकों की भर्ती तक सीमित नहीं रहा। प्रशिक्षण, सैन्य उपकरणों की आपूर्ति और दोनों देशों के सैन्य संस्थानों के बीच पेशेवर संपर्कों ने भी इस साझेदारी को मजबूत किया है।

भारतीय सैन्य संस्थानों में नेपाली अधिकारियों का प्रशिक्षण और दोनों सेनाओं के बीच नियमित संवाद लंबे समय से इस संबंध का हिस्सा रहे हैं।

‘सूर्य किरण’ है सैन्य सहयोग की मिसाल

भारत-नेपाल सैन्य सहयोग का प्रमुख उदाहरण संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘सूर्य किरण’ है। इस अभ्यास का उद्देश्य दोनों सेनाओं के बीच आपसी तालमेल और इंटरऑपरेबिलिटी को बढ़ाना है।

अभ्यास में आपदा प्रबंधन, आतंकवाद-रोधी अभियान और हिंसक उग्रवाद जैसी परिस्थितियों से निपटने की तैयारियों पर भी जोर दिया जाता है। दोनों देश संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में भी योगदान देते हैं।

उच्चस्तरीय सैन्य संपर्क से मजबूत होता भरोसा

भारत और नेपाल के बीच नियमित उच्चस्तरीय सैन्य यात्राएं दोनों देशों के संस्थागत संवाद को मजबूत करती हैं। मानद जनरल की परंपरा भी दोनों सेनाओं के बीच विशेष विश्वास का प्रतीक मानी जाती है।

संयुक्त सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण और वरिष्ठ अधिकारियों के बीच बातचीत इस रिश्ते को व्यावहारिक सहयोग में बदलने में मदद करती है।

भारत-नेपाल संबंधों के लिए अहम संदेश

जनरल धीरज सेठ की नेपाल यात्रा को केवल एक औपचारिक सैन्य दौरे के तौर पर देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह भारत और नेपाल के बीच ऐतिहासिक सैन्य संबंधों, वर्तमान सुरक्षा जरूरतों और भविष्य के संस्थागत सहयोग को रेखांकित करती है।

हिमालयी क्षेत्र में बदलते शक्ति संतुलन के बीच भारत और नेपाल के बीच मजबूत सैन्य संवाद दोनों देशों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है। वहीं, नेपाल में भारत की पारंपरिक और संस्थागत मौजूदगी चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच दक्षिण एशिया की रणनीतिक तस्वीर को भी प्रभावित करती है।

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