हिंदू धर्म में माता गायत्री को वेदों की जननी, ज्ञान की देवी और आध्यात्मिक शक्ति की प्रतीक माना जाता है। गायत्री जयंती, माता गायत्री के प्राकट्य का पर्व है, जिसे श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। विशेषकर दक्षिण भारत में इसे श्रावण पूर्णिमा को संस्कृत दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। आइए जानते हैं माता गायत्री की उत्पत्ति से जुड़ी पौराणिक कथाएं।
गायत्री माता का अवतरण: ब्रह्मा जी के यज्ञ से जुड़ी कथा
हिंदू शास्त्रों के अनुसार, सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा जी ने पृथ्वी पर मानव कल्याण के लिए एक यज्ञ का आयोजन किया। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार, यज्ञ में पति-पत्नी की उपस्थिति अनिवार्य होती है, लेकिन उस समय ब्रह्मा जी की पत्नी सावित्री समय पर नहीं पहुंच सकीं।
शुभ मुहूर्त निकट था और यज्ञ में विलंब नहीं किया जा सकता था। ऐसे में ब्रह्मा जी ने एक तपस्विनी कन्या — देवी गायत्री — से यज्ञ में सहधर्मिणी के रूप में भाग लेने का अनुरोध किया। कुछ ग्रंथों के अनुसार, उन्होंने गायत्री से विवाह भी किया और यज्ञ पूर्ण किया। इस प्रकार गायत्री माता का अवतरण हुआ और वे ब्रह्मा जी की सहधर्मिणी के रूप में प्रतिष्ठित हुईं।
गायत्री मंत्र का उद्भव और महर्षि विश्वामित्र की तपस्या
एक अन्य मान्यता के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा जी के मुख से गायत्री मंत्र प्रकट हुआ, जो चारों वेदों — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद — का सार है। ब्रह्मा जी ने अपने चार मुखों से इस मंत्र की व्याख्या करते हुए वेदों की रचना की, इसलिए माता गायत्री को वेदमाता भी कहा जाता है।
प्रारंभ में यह मंत्र केवल देवताओं तक सीमित था। लेकिन महर्षि विश्वामित्र ने कठिन तपस्या कर माता गायत्री को प्रसन्न किया और गायत्री मंत्र को जन-जन तक पहुंचाया। उन्होंने इसे मानव समाज के लिए मोक्ष और आत्मज्ञान का मार्ग बताया।
पुष्कर यज्ञ में गायत्री माता का प्राकट्य
राजस्थान के पुष्कर में स्थित एक कथा के अनुसार, ब्रह्मा जी ने जब यज्ञ करने का संकल्प लिया तो उन्होंने एक कमल पृथ्वी पर फेंका, जो पुष्कर में गिरा और वहीं एक पवित्र सरोवर बना। उन्होंने इसी स्थान पर यज्ञ प्रारंभ किया। सावित्री की अनुपस्थिति में ब्रह्मा जी ने गायत्री देवी का आवाहन किया, जो वहीं प्रकट हुईं और यज्ञ में सहभागी बनकर उसे पूर्ण कराया।
इस कथा में गायत्री माता को यज्ञ की शक्ति और धर्म-संस्थापक के रूप में दर्शाया गया है, जो सृष्टि की स्थिरता और कल्याण के लिए अवतरित हुईं।
गायत्री माता का अवतरण केवल पौराणिक घटना नहीं, बल्कि ज्ञान, तप, और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक है। गायत्री जयंती पर इन कथाओं का स्मरण करना आत्मचिंतन और आत्मसाक्षात्कार की दिशा में एक प्रेरणास्रोत है।