गोरखपुर में आयोजित **‘दीपोत्सव से राष्ट्रोत्सव’** कार्यक्रम में मुख्यमंत्री **योगी आदित्यनाथ** ने अपने भाषण से राजनीतिक बहस को नई दिशा दे दी। उन्होंने कहा कि,
> “ब्रिटिश और फ्रांसीसी उपनिवेशवाद की चर्चा तो होती है, लेकिन सनातन धर्म पर सबसे बड़ा प्रहार करने वाले ‘राजनीतिक इस्लाम’ की बात नहीं होती।”
योगी ने **छत्रपति शिवाजी**, **गुरु गोविंद सिंह** और **महाराणा प्रताप** को ‘राजनीतिक इस्लाम’ के खिलाफ संघर्ष के प्रतीक बताया। साथ ही **राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)** की 100 वर्ष की यात्रा की सराहना करते हुए कहा कि संघ ने **प्रतिबंध, लाठीचार्ज और गोलीबारी के बावजूद राम मंदिर निर्माण** को संभव बनाया।
अखिलेश यादव पर सीधा हमला
योगी ने **समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव** पर निशाना साधते हुए कहा –
> “अखिलेश न केवल रामद्रोही हैं, बल्कि कृष्णद्रोही भी हैं।”
यह बयान उस संदर्भ में आया जब अखिलेश यादव ने दीपोत्सव पर **सरकारी खर्च** पर सवाल उठाए थे। योगी ने पलटवार करते हुए कहा,
> “जिन्हें दीपावली से नफरत है, वे सनातन संस्कृति से विमुख हैं… गद्दी मिल सकती है, पर बुद्धि नहीं।”
राजनीतिक इस्लाम’ को बताया सबसे बड़ा खतरा
योगी ने कहा कि ‘राजनीतिक इस्लाम’ ने **सनातन धर्म पर विदेशी उपनिवेशवाद से भी बड़ा प्रहार** किया है।
उन्होंने दावा किया कि
> “हलाल उत्पादों की बिक्री से धर्मांतरण और आतंकवाद को मदद मिलती है।”
यह बयान केवल धार्मिक नहीं बल्कि **वैचारिक और राजनीतिक संदेश** भी देता है। योगी ने इस अवधारणा के ज़रिए **भारत के वर्तमान वैचारिक संघर्ष** को धार्मिक प्रतीकों के साथ जोड़ दिया है।
दीपोत्सव से 2027 की राजनीति तक
विश्लेषकों के अनुसार, योगी का यह वक्तव्य स्पष्ट संकेत है कि **2027 के विधानसभा चुनावों** की राह केवल विकास की नहीं, बल्कि **वैचारिक और सांस्कृतिक टकराव की राजनीति** से होकर गुज़रेगी।
‘राजनीतिक इस्लाम’, ‘रामद्रोही’ और ‘कृष्णद्रोही’ जैसे शब्द **उत्तर प्रदेश की आने वाली राजनीतिक भाषा** तय कर रहे हैं — एक ऐसी भाषा जो **भावनात्मक, तीखी और गहराई से सांस्कृतिक विमर्श से जुड़ी** है।
योगी ने अपने भाषण से यह संदेश दे दिया है कि **उत्तर प्रदेश की राजनीति अब “दीये की रोशनी” और “अंधकार के प्रतीक” के बीच की वैचारिक लड़ाई** बन चुकी है — फर्क बस इतना है कि यह दीप अब **मिट्टी का नहीं, विचार का** है।