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माता पार्वती ने क्यों ली भगवान राम की परीक्षा? जानें पूरी कथा

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हिंदू धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, त्रेता युग में जब भगवान राम माता सीता के हरण के बाद उन्हें व्याकुल होकर खोज रहे थे, तब भगवान शिव ने उनके दर्शन किए। श्रीराम को देखकर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और मन ही मन “सच्चिदानंद” का जाप करने लगे।

लेकिन माता सती (पार्वती का पूर्वजन्म) को यह विश्वास नहीं हुआ कि यही भगवान राम सर्वोच्च परमात्मा हैं। भगवान शिव के बार-बार समझाने पर भी उनके मन का संशय दूर नहीं हुआ। अंततः उन्होंने भगवान राम की परीक्षा लेने का निश्चय किया।

यह घटना कब हुई?

यह प्रसंग उस समय का है जब रावण माता सीता का हरण कर लंका ले गया था। भगवान राम और लक्ष्मण वन-वन भटककर उनकी खोज कर रहे थे।

उसी समय भगवान शिव और माता सती, काकभुशुंडि से भगवान राम की कथा सुनकर कैलाश लौट रहे थे। मार्ग में भगवान शिव ने श्रीराम के दर्शन किए। वे सीता-वियोग में व्याकुल होकर रो रहे थे। उनकी दिव्य लीला में व्यवधान न डालते हुए भगवान शिव ने दूर से ही उन्हें प्रणाम किया।

माता सती को यह देखकर आश्चर्य हुआ। उन्होंने भगवान शिव से पूछा,
“प्रभु! आप किसे प्रणाम कर रहे हैं?”

भगवान शिव ने उत्तर दिया,
“देवि! मैं अपने आराध्य भगवान राम को प्रणाम कर रहा हूँ, जिनकी कथा अभी हमने सुनी है।”

लेकिन सती ने जब श्रीराम को रोते और व्याकुल अवस्था में देखा, तो उनके मन में संदेह उत्पन्न हुआ कि क्या ये वास्तव में परमेश्वर हो सकते हैं?

सती ने ली भगवान राम की परीक्षा

भगवान शिव ने सती को बहुत समझाया, परंतु उनका संशय दूर नहीं हुआ। तब सती ने स्वयं भगवान राम की परीक्षा लेने का निश्चय किया।

उन्होंने माता सीता का रूप धारण किया और श्रीराम के सामने प्रकट हो गईं। लक्ष्मण जी ने उन्हें सीता के रूप में देखा, पर वे मौन रहे।

भगवान राम ने सती को देखते ही हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कहा,
“हे माँ! दशरथ पुत्र राम आपको प्रणाम करते हैं। आप अकेली वन में कैसे आईं? और आज भगवान शिव आपके साथ क्यों नहीं हैं?”

भगवान राम ने दिखाया अपना दिव्य स्वरूप

श्रीराम के मुख से “माँ” शब्द सुनते ही सती का संशय दूर हो गया। उन्हें समझ में आ गया कि भगवान राम सर्वज्ञ हैं और उन्होंने उनके वेश को पहचान लिया है।

कहा जाता है कि सती का भ्रम दूर करने के लिए भगवान राम ने उन्हें अपना दिव्य विष्णु रूप भी दिखाया। यह देखकर सती अत्यंत लज्जित हुईं और बिना कुछ कहे कैलाश लौट गईं।

शिव ने जान लिया सती का सत्य

कैलाश लौटने पर भगवान शिव ने सती से पूछा कि उन्होंने कैसी परीक्षा ली। सती ने संकोचवश असत्य कहा कि उन्होंने कोई परीक्षा नहीं ली, केवल प्रणाम कर लौटी हैं।

भगवान शिव ने ध्यान लगाकर संपूर्ण घटना जान ली। सती के इस व्यवहार से वे अत्यंत व्यथित हुए। मान्यता है कि इसके बाद भगवान शिव ने सती को उस शरीर में स्वीकार न करने का संकल्प लिया।

इसी कारण आगे चलकर सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में आत्मदाह किया और पुनर्जन्म लेकर पार्वती के रूप में जन्म लिया। बाद में उन्होंने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को पुनः पति रूप में प्राप्त किया।

कथा से मिलने वाली सीख

यह प्रसंग हमें सिखाता है कि ईश्वर की लीला को समझ पाना सामान्य बुद्धि से संभव नहीं है। श्रद्धा और विश्वास के बिना दिव्यता का अनुभव नहीं किया जा सकता। माता सती का संशय अंततः उनके जीवन में बड़ा परिवर्तन लेकर आया और वे पार्वती रूप में पुनर्जन्म लेकर शिव की अर्धांगिनी बनीं।

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