न्यायिक फैसलों में हो रही देरी पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी हाईकोर्ट्स के लिए नए और अनिवार्य दिशा-निर्देश जारी किए हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया। याचिका में हाईकोर्ट द्वारा फैसला सुनाने और वेबसाइट पर अपलोड करने में हुई देरी का मुद्दा उठाया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि सुरक्षित (रिजर्व) रखे गए फैसले अधिकतम तीन महीने के भीतर सुनाए जाने चाहिए। अदालत ने कहा कि न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के समान है और इससे मुकदमेबाजों को अपूरणीय क्षति पहुंचती है।
जमानत मामलों में भी सख्त निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत याचिकाओं को लेकर भी स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा कि जमानत याचिका पर फैसला उसी दिन सुनाया जाना चाहिए। यदि किसी विशेष परिस्थिति में आदेश सुरक्षित रखा जाता है, तो उसे अगले दिन सुनाकर वेबसाइट पर अपलोड करना अनिवार्य होगा।
इसके अलावा, जमानत या सजा निलंबन का आदेश जारी होते ही उसकी जानकारी तुरंत जेल प्रशासन को भेजी जाएगी। जेल अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि आदेश मिलने के बाद संबंधित व्यक्ति को उसी दिन या अधिकतम अगले दिन रिहा कर दिया जाए।
फैसले से जुड़े 5 अहम निर्देश
15 दिन में कारणयुक्त फैसला अपलोड करना होगा
यदि अदालत केवल फैसले का ऑपरेटिव हिस्सा सुनाती है, तो उसके पीछे के कारणों सहित विस्तृत निर्णय 15 दिनों के भीतर वेबसाइट पर अपलोड करना होगा। ऑपरेटिव हिस्सा सुनाए जाने की तारीख को ही फैसले की आधिकारिक तारीख माना जाएगा।
24 घंटे के भीतर वेबसाइट पर उपलब्ध हो फैसला
कारणयुक्त निर्णय खुले न्यायालय में सुनाए जाने के बाद उसे 24 घंटे के भीतर हाईकोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड करना होगा, ताकि पक्षकारों को उसकी प्रति प्राप्त करने के लिए लंबा इंतजार न करना पड़े।
रिजर्व फैसलों की तारीख सार्वजनिक होगी
बहस पूरी होने और फैसला सुरक्षित रखने की तारीख को हाईकोर्ट की वेबसाइट पर प्रदर्शित करना अनिवार्य होगा। इससे पक्षकारों को यह जानकारी मिल सकेगी कि मामला कब से लंबित है।
चार महीने बाद पक्षकार कर सकेंगे शिकायत
यदि कोई फैसला सुरक्षित रखने के चार महीने बाद भी नहीं सुनाया जाता है, तो संबंधित पक्षकार हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष मामला उठा सकेंगे। ऐसे आवेदन को दो दिनों के भीतर सूचीबद्ध करना होगा।
लंबित मामलों की नियमित निगरानी
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि सभी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश लंबित रिजर्व मामलों की निगरानी के लिए प्रशासनिक व्यवस्था विकसित करें। साथ ही जमानत पर रिहाई से जुड़े आदेशों के अनुपालन की रिपोर्ट भी नियमित रूप से हाईकोर्ट तक पहुंचेगी।
क्या है संविधान का अनुच्छेद 142?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को “पूर्ण न्याय” (Complete Justice) सुनिश्चित करने की विशेष शक्ति प्रदान करता है। इस प्रावधान के तहत शीर्ष अदालत किसी भी मामले में ऐसा आदेश या निर्देश जारी कर सकती है, जो न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हो।
अनुच्छेद 142 के जरिए सुप्रीम कोर्ट कई बार ऐसे फैसले दे चुका है, जिनका उद्देश्य कानूनी प्रक्रिया की जटिलताओं से ऊपर उठकर न्याय प्रदान करना रहा है। इसी विशेष शक्ति का इस्तेमाल करते हुए अदालत ने समयबद्ध न्याय सुनिश्चित करने के लिए ये व्यापक दिशानिर्देश जारी किए हैं।
झारखंड हाईकोर्ट के मामले से शुरू हुई बहस
यह मामला झारखंड हाईकोर्ट में फैसलों को लंबित रखने और उन्हें समय पर अपलोड न करने से जुड़ा था। सुप्रीम कोर्ट के सामने एक ऐसा मामला आया, जिसमें सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला लगभग दो वर्षों तक सुरक्षित रखा गया।
बाद में 4 दिसंबर 2025 को केवल फैसले का ऑपरेटिव हिस्सा सुनाया गया, लेकिन कारणयुक्त आदेश लंबे समय तक जारी नहीं किया गया। सुनवाई के दौरान झारखंड हाईकोर्ट की रिपोर्ट में 67 ऐसे मामलों का खुलासा हुआ, जिनमें आदेश सुरक्षित रखने के बाद भी फैसला लंबित था।
इस स्थिति को गंभीर मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट्स से लंबित फैसलों का डेटा मांगा और पूरे देश के लिए एक समान दिशा-निर्देश जारी करने का फैसला किया।
पहले भी जताई थी चिंता
पिछले वर्ष मई में भी सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट में 67 आपराधिक अपीलों के फैसले लंबित रहने पर चिंता जताई थी। उस समय भी न्यायमूर्ति सूर्यकांत उस पीठ का हिस्सा थे जिसने इस मामले पर सवाल उठाए थे।
अदालत ने तब कहा था कि लंबित फैसलों की समस्या न्यायिक व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है और इसके समाधान के लिए अनिवार्य दिशानिर्देश तैयार किए जाएंगे।
न्यायपालिका में बढ़ेगा भरोसा
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को सर्वोच्च महत्व दिया है। अदालत का मानना है कि यदि किसी व्यक्ति को जमानत मिल चुकी है, तो केवल प्रशासनिक या तकनीकी कारणों से उसकी रिहाई में देरी स्वीकार नहीं की जा सकती।
विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इन नए निर्देशों से लंबित मामलों के निपटारे में तेजी आएगी, न्याय प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनेगी और आम लोगों का न्यायपालिका पर भरोसा और मजबूत होगा।