गुरुवार का दिन भगवान विष्णु, सृष्टि के पालनकर्ता और दयालु प्रभु, को समर्पित है। इस पावन दिन पर भक्तजन उनके प्रति अपनी भक्ति और श्रद्धा को पूजा, व्रत और भजन के माध्यम से व्यक्त करते हैं।
भजन गाने का महत्व
मान्यता है कि भगवान विष्णु के भजन गाने से मन को शांति, जीवन में सुख-समृद्धि और उनके दिव्य आशीर्वाद की प्राप्ति होती है।
आइए, इस शुभ अवसर पर भक्ति भाव के साथ उनके भजनों का गान करें और उनके चरणों में अपनी अराधना अर्पित करें।
भगवान विष्णु जी का भजन
मधुर वाणी और मूल मंत्र
विष्णु विष्णु तू भण रे प्राणी, बोल सदा शुरु मीठी वाणी।
जुगती मुगति पाई रे, इण मूल मंत्र से।
शुद्धता और नियम
तीस दिवस तक सुतक रखना, पांच दिवस ऋतुवन्ती रहणा।
बेगो उठने न्हाई रे, नित निर्मल जल से।
संतोष और आराधना
शील संतोष सुधिरा किये, दोनो काल की संध्या किजे।
भजन आरति गाई रे, नित प्रेम भाव सु।
हवन और सच्चे भाव
प्रात:काल नित हवन करिजे, ईधण पाणी दूध छाणीजे।
मीठा बोल सुणाई रे, नित सच्चे भाव सु।
क्षमा और दया का भाव
क्षमा दया हृदय नित धारो, चोरी निन्दा झूठ निवारो।
व्यर्थ विवाद मिटाई रे, अहंकारी मन सु।
व्रत और नामस्मरण
व्रत अमावस को राखिजे, विष्णु नाम को जाप जपिजे।
जीवों पे दया दिखाई रे, नित करूण भाव से।
पर्यावरण की रक्षा
लीलो रूख मति काटिजे, अजर काम अरु क्रोध जरीजे।
पर्यावरण बचाई रे, नित सेवा भाव सु।
धर्म और करुणा
निज हाथो से भोजन पकाजे, बकरा बैल अपर रखाजे।
साचो धर्म निभाई रे, मत करि शर्म तु।
बुरी आदतों का त्याग
अमल तंबाकु भांग न पीणा, मद मांस का नाम ना लेणा।
सदा ही डरतो रही रे, इण बुरे कर्म सु।
गुरु की शरण और बिश्नोई धर्म
नीलो पहरण मना करायो, रामरतन गुरु शरणे आयो।
बिश्नोई कहलाई रे, उनतीस धर्म सु।