रामायण में, जब भगवान राम और विभीषण मिले, तो किसी ने नहीं सोचा था कि राम तुरंत उन्हें लंका का राजा बना देंगे। विभीषण, महान ऋषि विश्रवा और राक्षसी कैकसी के पुत्र, रावण और कुंभकर्ण के छोटे भाई थे। बचपन से ही वह भगवान विष्णु के भक्त थे और राक्षसों के बीच रहते हुए भी उनकी पूजा करते थे।
रावण ने जब सीता का अपहरण किया, तो विभीषण ने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन रावण ने नहीं सुनी। रावण की नाराज़गी के कारण विभीषण को लंका से निकाल दिया गया। इसके बाद, वह भगवान राम की शरण में आए और युद्ध का रुख पूरी तरह बदल गया।
हनुमान की सलाह
भगवान राम हनुमान पर भरोसा करते थे। हनुमान पहले ही लंका में विभीषण से मिल चुके थे और उनके चरित्र से परिचित थे। उन्होंने राम को विभीषण को स्वीकार करने की सलाह दी, जिससे राम के आधे संदेह दूर हो गए।
माता सीता की मदद
कहते हैं कि त्रिजटा, विभीषण की बेटी, माता सीता की मदद करती थीं। विभीषण ने अपनी बेटी के ज़रिए सीता को सांत्वना दी, जिससे भगवान राम बहुत खुश हुए।
शरण मांगने वालों की मदद
वानर सेना प्रारंभ में विभीषण पर शक करती थी। राम ने उन्हें धर्म और इतिहास के उदाहरण देकर समझाया कि शरण मांगने वाले की मदद करना ज़रूरी है।
दुश्मन के रहस्य जानना
विभीषण रावण के छोटे भाई होने के कारण लंका और उसकी सेना के रहस्य जानते थे। उन्होंने राम को समय-समय पर सही सलाह दी, जिससे युद्ध में विजय सुनिश्चित हुई।
लंका का अगला राजा
राम का मकसद सिर्फ़ सीता को वापस लाना था, लंका पर कब्ज़ा नहीं। रावण की मृत्यु के बाद लंका के लिए योग्य शासक की ज़रूरत थी। भगवान राम ने विभीषण को लंका का अगला राजा घोषित किया और उनका राज्याभिषेक वानर सेना के सामने किया।
समुद्र किनारे हुई राम और विभीषण की मुलाकात ने युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विभीषण ने राम और उनकी सेना को कई मौकों पर मदद दी, और रावण को हराने के बाद उन्हें लंका का राजा बना दिया गया।