NATIONAL THOUGHTS

A Web Portal Of Positive Journalism 

आज की कहानी-धनुर्धर थिम्मन

Share This Post

एक मशहूर शिकारी धनुर्धर थिम्मन एक दिन शिकार के लिए गए। वापसी मे जंगल में उन्हें एक मंदिर मिला, बेहद ही शांत वातावरण था वहां का अंदर एक शिवलिंग था। शिव के विषय में उसे इतना ही पता था कि वे देवो के देव है , सारी सृष्टि के संचालक है। 
 
मंदिर के आस पास पवित्र वातावरण निर्मित था थिम्मन उस शांत वातावरण में घंटों बैठे रहे शिव के लिए एक गहरा प्रेम भर गया और जाते समय उन्होंने वहां कुछ अर्पण करना चाहा। लेकिन उन्हें समझ नहीं आया कि कैसे और किस विधि ये काम करें। आखिर उन्होंने भोलेपन में अपने पास मौजूद मांस ही लिंग पर अर्पित कर दिया और खुश होकर चले गए कि शिव ने अवश्य उनका चढ़ावा स्वीकार कर लिया होगा ।
 
उस मंदिर की देखभाल एक ब्राह्मण करता था जो उस मंदिर से कहीं दूर रहता था। हालांकि वह शिव का भक्त था लेकिन वह रोजाना इतनी दूर मंदिर तक नहीं आ सकता था इसलिए वह कुछ दिनों में एक बार आता था। संयोग से अगले दिन ही जब ब्राह्मण देव वहां पहुंचे, तो लिंग के बगल में मांस पड़ा देखकर वह भौंचक्के रह गये।
 
 यह सोचते हुए कि यह किसी जानवर का काम होगा, उन्होंने मंदिर की सफाई कर दी, अपनी पूजा की और चले गये। अगली बार, थिम्मन और मांस अर्पण करने के लिए लाए। उन्हें किसी पूजा पाठ की जानकारी नहीं थी, इसलिए वह बैठकर शिव से अपने दिल की बात करने लगे। फिर वह मांस चढ़ाने के लिए रोज आने लगे। 
 
एक दिन उन्हें लगा कि लिंग की सफाई भी जरूरी है लेकिन उनके पास पानी लाने के लिए कोई बर्तन नहीं था। इसलिए वह झरने तक गए और अपने हाथ और मुंह में पानी भर कर लाए और वही पानी लिंग पर डाल दिया।
 
जब ब्राह्मण वापस मंदिर आया तो मंदिर में मांस और लिंग पर थूक सा देखकर घृणा से भर गया। वह जानता था कि ऐसा कोई जानवर नहीं कर सकता। यह कोई इंसान ही कर सकता था। उसने मंदिर साफ किया, लिंग को शुद्ध करने के लिए मंत्र पढ़े। फिर पूजा पाठ करके चला गया। लेकिन हर बार आने पर उसे लिंग उसी अशुद्ध अवस्था में मिलता। 
 
एक दिन उसने आंसुओं से भरकर शिव से पूछा, “हे देवों के देव, आप अपना इतना अपमान कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं।और वापस लौट आया रात को स्वप्न में एकाएक उसे लगा कोई उसके कानों में कह रहा है, “जिसे तुम अपमान मानते हो, वह एक दूसरे भक्त का अर्पण है।
 
 मैं उसकी सच्ची भक्ति से बंधा गया हूं और वह जो भी अर्पित करता है, उसे स्वीकार करता हूं। सुबह उठ कर ब्राह्मण को अजीब सा महसूस हुवा । आखिर उसने निर्णय लिया यदि स्वप्न सत्य था,और अगर ऐसा कोई भक्त हैं तो बड़ा विचित्र भक्त हैं ठीक है उसकी भक्ति की गहराई या जो भी है देखना चाहता हूं , तो पास में कहीं जाकर छिप गया अब उसे देख कर ही जाऊंगा वह आयेगा तो है ही।”
 
ब्राह्मण एक झाड़ी के पीछे छिप गया। शाम के समय थिम्मन मांस और पानी के साथ आया। मांस चढ़ाया तो वह नीचे गिर गया उसे न जाने क्यों लगा कि शिव आज हमेशा की तरह उसका चढ़ावा स्वीकार नहीं कर रहे। 
 
वह सोचने लगा कि उसने कौन सा पाप कर दिया है। उसने लिंग को करीब से देखा तो पाया कि लिंग की दाहिनी आंख से कुछ रिस रहा है। उसने उस आंख में पास से लाकर जड़ी-बूटी लगाई ताकि वह ठीक हो सके लेकिन उससे और रक्त आने लगा। 
 
आखिरकार, फिर उसने अपनी आंख देने का फैसला किया। उसने अपना एक चाकू निकाला, अपनी दाहिनी आंख निकाली और उसे लिंग पर रख दिया। रक्‍त टपकना बंद हो गया और थिम्मन ने राहत की सांस ली। लेकिन तभी उसका ध्यान गया कि लिंग की बाईं आंख से भी रक्त निकल रहा है।
 
 उसने तत्काल अपनी दूसरी आंख निकालने के लिए चाकू निकाल लिया, लेकिन फिर उसे लगा कि वह देख नहीं पाएगा कि उस आंख को कहां रखना है। तो उसने लिंग पर अपना पैर रखा और अपनी आंख निकाल ली।
 
 और पाव की जगह लगा दी अब उसकी अपार भक्ति को देखते हुए, शिव ने थिम्मन को दर्शन दिए। उसकी आंखों की रोशनी वापस आ गई और वह शिव के आगे दंडवत हो गया। उसे कन्नप्पा नयनार के नाम से जाना गया। कन्ना यानी आंखें अर्पित करने वाला नयनार यानी शिव भक्त।
 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *