प्राचीन काल में एक महान तपस्वी ऋषि थे—जरत्कारु। वे ब्रह्मचारी, अत्यंत संयमी और उग्र तपस्या में लीन रहने वाले थे। उन्होंने आहार और इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण पा लिया था। कभी केवल वायु पर जीवित रहते, तो कभी पूर्ण उपवास करते थे। उन्होंने निद्रा तक पर विजय प्राप्त कर ली थी।
वे जहाँ संध्या होती, वहीं विश्राम करते और तीर्थ-तीर्थ भ्रमण करते हुए तप में लीन रहते थे। उनका तेज प्रज्वलित अग्नि के समान था।
पितरों की करुण स्थिति
एक दिन भ्रमण करते हुए उन्होंने एक विचित्र और करुण दृश्य देखा। उनके पितर (पूर्वज) एक गहरे गड्ढे में उल्टे लटके हुए थे—पैर ऊपर और सिर नीचे। वे एक सूखे तिनकों के सहारे किसी तरह टिके थे, जिसे एक चूहा धीरे-धीरे कुतर रहा था।
ऋषि ने पूछा—“आप कौन हैं, जो इस प्रकार कष्ट भोग रहे हैं?”
पितरों ने उत्तर दिया—“ब्रह्मन! हम तुम्हारे पूर्वज हैं। हमारी वंश-परंपरा समाप्त होने के कारण हम इस संकट में पड़े हैं। हमारी एकमात्र संतान ‘जरत्कारु’ विवाह नहीं करना चाहता, इसलिए हमारा उद्धार नहीं हो पा रहा है।”
विवाह का संकल्प
यह सुनकर ऋषि भावुक हो उठे और बोले—“मैं ही आपका पुत्र जरत्कारु हूँ। बताइए, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?”
पितरों ने कहा—“वत्स! तुम विवाह करो और संतान उत्पन्न करो, तभी हमारा उद्धार होगा।”
ऋषि ने उत्तर दिया—
“मैंने आजीवन ब्रह्मचर्य का संकल्प लिया है, परंतु यदि आपके कल्याण के लिए आवश्यक है, तो मैं विवाह करूँगा—एक शर्त पर।”
शर्त:
कन्या का नाम भी ‘जरत्कारु’ हो
उसे उसके परिजन स्वयं दें
वह मुझे भिक्षा के समान प्राप्त हो
वासुकि की बहन से विवाह
ऋषि ऐसी कन्या की खोज में निकल पड़े। एक दिन उन्होंने वन में खड़े होकर तीन बार पुकारा—“कोई मुझे भिक्षा के रूप में कन्या दे!”
तभी नागराज वासुकि अपनी बहन को लेकर आए और बोले—
“मुनिवर! यह मेरी बहन है, इसे स्वीकार करें।”
ऋषि ने पूछा—“क्या इसका नाम भी मेरे समान है?”
वासुकि ने कहा—“हाँ, इसका नाम भी ‘जरत्कारु’ है।”
यह सुनकर ऋषि ने शास्त्र-विधि से उसका पाणिग्रहण किया।
विवाह के पीछे का रहस्य
इस विवाह के पीछे एक गहरा कारण था। नागमाता कद्रू ने सर्पों को शाप दिया था कि वे भविष्य में राजा जनमेजय के सर्पयज्ञ में भस्म हो जाएँगे।
इस शाप से मुक्ति दिलाने के लिए ही वासुकि ने अपनी बहन का विवाह ऋषि जरत्कारु से कराया।
आस्तीक का जन्म
समय आने पर नागकन्या के गर्भ से एक तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ—आस्तीक।
वे वेद-वेदांगों के ज्ञाता, महान तपस्वी और अत्यंत बुद्धिमान थे। उन्होंने अपने पितृकुल और मातृकुल दोनों का उद्धार किया।
सर्प यज्ञ और तक्षक की रक्षा
कुछ समय बाद राजा जनमेजय ने सर्पों के विनाश के लिए सर्पसत्र यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में अनेक नाग अग्नि में गिरने लगे।
तभी आस्तीक वहाँ पहुँचे और अपने ज्ञान व तपोबल से यज्ञ को रोक दिया।
उन्होंने न केवल नागों को विनाश से बचाया, बल्कि तक्षक नाग की भी रक्षा की।
पितरों का उद्धार और अंत
आस्तीक ने अपने कर्मों से सभी ऋणों से मुक्ति पाई—
देवताओं को यज्ञ से तृप्त किया
ऋषियों को ब्रह्मचर्य से संतुष्ट किया
पितरों का संतान द्वारा उद्धार किया
अंततः ऋषि जरत्कारु भी अपने पितरों के साथ स्वर्गलोक को प्राप्त हुए।
यह कथा त्याग, कर्तव्य और वंश परंपरा के महत्व को दर्शाती है। आस्तीक के जन्म और उनके कार्यों ने न केवल नागों को विनाश से बचाया, बल्कि पितरों का भी उद्धार किया।