तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने बुधवार को समाज सुधारक पेरियार ई.वी. रामासामी की 52वीं पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने पेरियार को ऐसा महान व्यक्तित्व बताया, जिन्होंने समाज में आत्मसम्मान, तर्कसंगत सोच और समानता की भावना जगाई।
स्टालिन ने कहा कि पेरियार ने झुके हुए लोगों को सीधा खड़ा किया और उन्हें गरिमा के साथ सिर ऊंचा रखकर जीने की शक्ति दी। उन्होंने अपना पूरा जीवन तमिलनाडु की धरती और यहां के लोगों को समर्पित कर दिया।
“तमिल लोग कभी सिर नहीं झुकाएंगे”
मुख्यमंत्री ने जोर देकर कहा कि तमिल समाज कभी भी किसी के प्रभुत्व के आगे नहीं झुकेगा। पेरियार के तर्कवाद, मानवतावाद और सामाजिक समानता के सिद्धांत आज भी तमिल समाज का मार्गदर्शन कर रहे हैं।
एक्स (X) पर पोस्ट करते हुए स्टालिन ने लिखा कि पेरियार ने झुकी हुई कमर को सीधा किया और लोगों को आत्मसम्मान के साथ खड़ा होना सिखाया। उन्होंने कहा कि तर्क, समानता और मानवता ही तमिल समाज की पहचान और गौरव हैं।
तमिलनाडु की एकजुटता पर जोर
स्टालिन ने अपने संदेश में कहा कि जो ताकतें पेरियार की विरासत को कमजोर करने की कोशिश कर रही हैं, वे कभी सफल नहीं होंगी। अगर तमिलनाडु एकजुट होकर ऐसी साजिशों को नाकाम कर देता है, तो जीत हमेशा तमिल समाज की होगी।
कनिमोझी का बयान: पेरियार ने मुक्ति की नींव रखी
डीएमके सांसद के. कनिमोझी ने कहा कि पेरियार ने उस सामाजिक मुक्ति की नींव रखी, जिसकी समाज को सदियों से प्रतीक्षा थी। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियों को भी पेरियार की स्मृति और उनके सिद्धांतों का सम्मान करना चाहिए और उनके संघर्ष को आगे बढ़ाना चाहिए।
आत्मसम्मान आंदोलन की शुरुआत
ई.वी. रामासामी ‘पेरियार’ ने वर्ष 1925 में ब्राह्मणवादी वर्चस्व को चुनौती देने और गैर-ब्राह्मण समुदायों के उत्थान के लिए आत्मसम्मान आंदोलन की शुरुआत की थी। उन्होंने अपने जर्नल ‘कुड़ी अरसु’ के माध्यम से तर्कवाद, लैंगिक समानता और जाति-विरोधी विचारों का प्रसार किया।
1925: आत्मसम्मान आंदोलन का ऐतिहासिक वर्ष
आत्मसम्मान आंदोलन के इतिहास में वर्ष 1925 बेहद अहम रहा। मई में ‘कुड़ी अरसु’ का प्रकाशन हुआ और नवंबर में पेरियार ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से नाता तोड़ लिया। इस प्रकाशन ने मद्रास प्रेसीडेंसी में सामाजिक सुधार को नई दिशा दी और आगे चलकर द्रविड़ आंदोलन के उदय का आधार बना।