सुप्रीम कोर्ट ने फ्री बीज यानी मुफ्त की रेवड़ियों के मुद्दे पर कड़ी फटकार लगाई है। जजों के वेतन में परेशानी पर भी कोर्ट ने अपनी नाराजगी व्यक्त की। न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने राज्य सरकारों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि चुनावी वादों के लिए सरकारों के पास पैसे की कोई कमी नहीं है, लेकिन जजों को वेतन देने में परेशानी हो रही है।
चुनावी वादों और जजों के वेतन में फर्क
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी तब आई है जब पूरे देश में विभिन्न राज्यों में मुफ्त योजनाओं की बाढ़ सी आ गई है। दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले विभिन्न राजनीतिक दलों ने मुफ्त बिजली, पानी, और अन्य सुविधाओं के वादे किए हैं। दिल्ली में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसी पार्टियां सत्ता में आने पर लोगों को मुफ्त सुविधाएं देने का वादा कर रही हैं। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर चिंता व्यक्त की है कि जब सरकारों के पास चुनावी वादों के लिए पैसा है, तो जजों के वेतन में परेशानी क्यों आ रही है?
सुप्रीम कोर्ट का आदेश और चुनावी मुद्दे
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी उस समय की जब अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणि ने सरकारों के सामने वित्तीय बाधाओं की दलील दी थी, खासकर न्यायिक अधिकारियों के वेतन और पेंशन के संदर्भ में। वेंकटरमणि ने कहा कि सरकार को न्यायिक अधिकारियों के वित्तीय लाभों पर निर्णय लेते वक्त वित्तीय चिंताओं का ध्यान रखना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से यह साफ हो गया कि मुफ्त योजनाओं के चुनावी फायदे तो हैं, लेकिन न्यायिक व्यवस्था को मजबूत बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।