सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कलकत्ता हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को निर्देश दिया कि पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत दायर आपत्तियों की जांच के लिए पर्याप्त न्यायिक अधिकारियों की तैनाती सुनिश्चित की जाए।
झारखंड और ओडिशा से भी ली जा सकेगी मदद
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जरूरत पड़ने पर झारखंड और ओडिशा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से भी सहायता ली जा सकती है। वहां के वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों को इस प्रक्रिया में शामिल किया जा सकता है।
50 लाख से अधिक आपत्तियों की जांच की चुनौती
यह निर्देश उस समय जारी किया गया जब कलकत्ता हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने बताया कि ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ श्रेणी के तहत 50 लाख से ज्यादा आपत्तियों का निर्धारित समयसीमा में सत्यापन करना चुनौतीपूर्ण है। हाई कोर्ट के अनुसार, 250 न्यायिक अधिकारियों की तैनाती के बावजूद प्रक्रिया पूरी करने में करीब 80 दिन लग सकते हैं।
तीन साल अनुभव वाले सिविल जजों की तैनाती
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहले से नियुक्त अधिकारियों के अलावा, तीन साल के अनुभव वाले सिविल जजों को भी सत्यापन कार्य में लगाया जा सकता है। यदि अतिरिक्त संसाधनों की आवश्यकता हो, तो अन्य राज्यों से भी न्यायिक अधिकारी बुलाए जा सकते हैं।
खर्च उठाएगा चुनाव आयोग
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बाहरी राज्यों से आने वाले न्यायिक अधिकारियों के यात्रा, ठहरने, वेतन और मानदेय सहित सभी खर्च चुनाव आयोग वहन करेगा।
विधानसभा चुनाव से पहले सत्यापन पर जोर
न्यायालय का उद्देश्य आगामी विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से जुड़ी सभी आपत्तियों का समयबद्ध और निष्पक्ष सत्यापन सुनिश्चित करना है।