सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक सुनवाई के दौरान स्पष्ट रूप से कहा कि वोट पाने के लिए क्षेत्रीयता को बढ़ावा देना भारत की एकता और अखंडता के लिए सांप्रदायिकता जितना ही खतरनाक है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने यह टिप्पणी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) का पंजीकरण रद्द करने की याचिका पर सुनवाई करते हुए दी।
सिर्फ एक दल नहीं, पूरी व्यवस्था की ज़रूरत है समीक्षा की
अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि जब कई राजनीतिक दल धर्म और जाति के आधार पर राजनीति कर रहे हैं, तब केवल एक पार्टी को निशाना नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने कहा,
“अगर आप राजनीतिक सुधार चाहते हैं, तो सभी दलों के लिए एकसमान मापदंड होने चाहिए। केवल AIMIM पर ध्यान केंद्रित करना पर्याप्त नहीं है।”
याचिकाकर्ता की दलीलें और कोर्ट की प्रतिक्रिया
याचिकाकर्ता तिरुपति नरसिंह मुरारी ने आरोप लगाया था कि AIMIM सिर्फ मुस्लिम समुदाय के लिए काम कर रही है और धार्मिक ग्रंथों का प्रचार करती है, जो भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के खिलाफ है। इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक कोई दल संविधान के खिलाफ प्रत्यक्ष रूप से कार्य नहीं करता, तब तक उसका पंजीकरण रद्द करने का आधार नहीं बनता।
सुप्रीम कोर्ट की दो प्रमुख टिप्पणियां
“धर्म और जाति के आधार पर राजनीति पूरी व्यवस्था की समस्या है, सिर्फ किसी एक दल की नहीं।”
“राजनीतिक सुधार व्यापक हों, न कि पूर्वाग्रह से प्रेरित।”
सुधार की दिशा में व्यापक सोच की आवश्यकता
सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि यदि याचिकाकर्ता वास्तव में लोकतंत्र को मजबूत करना चाहते हैं, तो ऐसी याचिका दायर करें जो सभी राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली की समीक्षा की मांग करे। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पिछड़े वर्गों या कमजोर समुदायों के हित में कार्य करना असंवैधानिक नहीं है।
राजनीति में एकतरफा याचिकाएं नहीं हों कारगर
अदालत ने यह भी कहा कि न्यायपालिका राजनीति में सीधा हस्तक्षेप नहीं करना चाहती, जब तक कि कोई संविधान विरोधी कार्य स्पष्ट न हो। ऐसे में एकतरफा याचिकाएं, जो सिर्फ एक पार्टी को निशाना बनाती हैं, वे सुधार के उद्देश्य को कमजोर करती हैं।
सुधार सभी पर लागू हो
AIMIM के पंजीकरण रद्द करने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी केवल एक दल के संदर्भ में नहीं, बल्कि संपूर्ण राजनीतिक तंत्र की चिंताओं को उजागर करती है। यह फैसला इस ओर संकेत करता है कि अब भारत को ऐसी बहस और कानूनी रूपरेखा की आवश्यकता है, जो धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और पारदर्शिता के मूल्यों पर आधारित राजनीति सुनिश्चित करे।