पिछले कुछ दिनों से झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) नेता चंपई सोरेन सुर्खियों में बने हुए हैं। उनके भाजपा में शामिल होने की अटकलें जोर पकड़ रही थीं, लेकिन चंपई सोरेन ने खुद सामने आकर इन खबरों का खंडन किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी किसी भाजपा नेता से मुलाकात नहीं हुई है, और वे दिल्ली में निजी काम से आए थे। उन्होंने यह भी कहा कि वह भाजपा में शामिल होने की चर्चाओं को समझ नहीं पा रहे हैं।
हालांकि चंपई सोरेन ने झामुमो से किनारा कर लिया है, लेकिन अभी तक उन्होंने पार्टी से या अपने पद से इस्तीफा नहीं दिया है। मंगलवार को वह दिल्ली से कोलकाता लौट गए और जल्द ही रांची पहुंचकर आगे की रणनीति पर काम करेंगे। उनके पास तीन विकल्प हैं: अपनी पार्टी बनाना, राजनीति से संन्यास लेना, या किसी अन्य दल के साथ हो लेना। अब देखना होगा कि चंपई इनमें से किस विकल्प को चुनते हैं।
सूत्रों के मुताबिक, चंपई सोरेन की बीजेपी में दमदार एंट्री की योजना बनाई जा रही है। वह अपने गृहक्षेत्र लौट आए हैं और संभवतः भाजपा में अपनी शुरुआत शक्ति प्रदर्शन के साथ करेंगे। ऐसी भी खबरें हैं कि भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा उन्हें पार्टी में शामिल कराने आ सकते हैं। हालांकि, चंपई सोरेन ने इन चर्चाओं को अफवाह बताया है और कहा है कि वह निजी काम से दिल्ली गए थे।
झामुमो से विद्रोह के बाद चंपई सोरेन के पास सीमित विकल्प बचे हैं। पहला विकल्प, जिसकी चर्चा मीडिया में हो रही है, यह है कि वह बीजेपी में शामिल हो सकते हैं। दूसरा, वह खुद का राजनीतिक दल बना सकते हैं। हालांकि, विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही महीनों का वक्त बचा है, ऐसे में नया संगठन खड़ा करना उनके लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। तीसरा, चंपई सोरेन झारखंड की स्थानीय राजनीति में सक्रिय जयराम महतो के साथ मिलकर चुनाव लड़ सकते हैं।
2019 के विधानसभा चुनाव और हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी की कमजोरी उभरकर सामने आई है। 2019 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी राज्य की आदिवासियों के लिए सुरक्षित 28 सीटों में से केवल दो सीटें जीत पाई थी। वहीं इस बार लोकसभा चुनाव में राज्य की सभी पांच आदिवासी सुरक्षित सीटें हार गईं। इससे यह स्पष्ट है कि आदिवासी समाज का वोट हासिल करने के लिए बीजेपी को अभी खासी मेहनत करनी होगी।
चंपई सोरेन का बीजेपी में शामिल होना अभी तय नहीं है, लेकिन उनसे पहले भी कई झामुमो नेता पार्टी छोड़ चुके हैं और राजनीतिक सफलता नहीं हासिल कर सके। सूरज मंडल, कृष्णा मार्डी, स्टीफन मरांडी जैसे कद्दावर नेताओं ने पार्टी से अलग होकर नई राह अपनाई, लेकिन उनका राजनीतिक करियर खत्म हो गया। हालांकि अर्जुन मुंडा और विद्युतवरण महतो जैसे कुछ नेता अपवाद साबित हुए हैं।
अब यह देखना होगा कि चंपई सोरेन अपने राजनीतिक सफर को किस दिशा में ले जाते हैं और उनका अगला कदम क्या होगा।