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निर्जला एकादशी 2025: क्यों कहते हैं इसे भीमसेनी एकादशी?

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निर्जला एकादशी, हिंदू धर्म में सबसे कठिन और पुण्यदायक व्रतों में मानी जाती है। यह व्रत ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है। इसे भीमसेनी एकादशी या पांडव एकादशी भी कहा जाता है क्योंकि इसका संबंध महाभारत के महान योद्धा भीमसेन से जुड़ा हुआ है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है और इसमें जल और अन्न का पूर्ण त्याग किया जाता है, इसलिए इसे “निर्जला” एकादशी कहा गया है।

भीमसेनी एकादशी की कथा

इस एकादशी को भीमसेनी एकादशी कहे जाने के पीछे एक पौराणिक कथा है। भीम, जो अपनी अपार भूख और बल के लिए प्रसिद्ध थे, अन्य सभी एकादशियों का व्रत नहीं रख पाते थे। उन्हें दुख होता था कि वे एकादशी व्रत का पुण्य नहीं कमा पा रहे।

उन्होंने यह समस्या महर्षि वेदव्यास को बताई। वेदव्यास जी ने उन्हें एक उपाय बताया – निर्जला एकादशी का व्रत, जो सभी 24 एकादशियों के बराबर पुण्य देता है। इस कठिन व्रत को केवल जल तक से दूर रहकर किया जाता है।

पौराणिक प्रसंग: भीम और निर्जला व्रत

महर्षि वेदव्यास की सलाह पर भीम ने संकल्प लिया और पूरे नियमों के साथ इस व्रत को किया। उन्होंने भगवान विष्णु की पूजा, मंत्र जाप, और पूरे दिन निर्जल उपवास किया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें सभी एकादशियों का पुण्य प्रदान किया। तभी से यह व्रत भीमसेनी एकादशी के नाम से जाना गया।

व्रत का महत्व

यह व्रत वर्ष की सभी 24 एकादशियों का पुण्य एक साथ प्रदान करता है।

यह उन लोगों के लिए अत्यंत लाभकारी है जो सभी एकादशियों का व्रत नहीं रख सकते।

यह पापों के नाश और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग माना गया है।

यह आत्मसंयम, धैर्य और तप की परीक्षा है जो मानसिक और आध्यात्मिक बल को बढ़ाता है।

निर्जला एकादशी 2025 की तिथि व समय

तारीख: 4 जून 2025, बुधवार

एकादशी तिथि प्रारंभ: 4 जून को प्रातः 2:24 बजे

एकादशी तिथि समाप्त: 5 जून को प्रातः 4:31 बजे

व्रत पारण (उपवास खोलना): 5 जून को सुबह 5:24 से 8:09 बजे तक

शुभ मुहूर्त

ब्रह्म मुहूर्त: 4:02 बजे से 4:42 बजे

अभिजीत मुहूर्त: 12:03 बजे से 12:57 बजे

विजय मुहूर्त: 2:45 बजे से 3:39 बजे

सर्वार्थ सिद्धि योग: 4 जून को सुबह 6:34 बजे तक

व्रत की पूजा विधि व नियम

ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

भगवान विष्णु के समक्ष जल, तिल और कुश लेकर व्रत का संकल्प लें।

विष्णु व लक्ष्मी जी की पूजा करें – तुलसी, चंदन, फूल, धूप, नैवेद्य अर्पित करें।

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का 108 बार जाप करें।

भीमसेनी एकादशी की कथा पढ़ें या श्रवण करें।

रातभर जागरण कर भगवान विष्णु की आराधना करें।

अगले दिन व्रत पारण के समय ब्राह्मणों या गरीबों को अन्न, जल, वस्त्र और दक्षिणा दान करें।

क्रोध, झूठ, तामसिक भोजन और नकारात्मक विचारों से दूर रहें।

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