NATIONAL THOUGHTS

A Web Portal Of Positive Journalism 

“कर्नाटक जाति जनगणना विवाद में नया मोड़: ऑरिजनल रिपोर्ट रहस्यमय ढंग से लापता!”

Share This Post

कर्नाटक की विवादास्पद सामाजिक-आर्थिक एवं शिक्षा सर्वेक्षण रिपोर्ट, जिसे आमतौर पर ‘जाति जनगणना’ कहा जाता है, एक बार फिर सुर्खियों में है। रिपोर्ट तैयार करने वाले कंथाराजू आयोग की मूल प्रति के गायब होने की खबर ने राजनीतिक हलकों में खलबली मचा दी है।

सरकार का दावा: डाटा सिस्टम में सुरक्षित है
कांग्रेस सरकार ने रिपोर्ट की मूल प्रति के गायब होने को गंभीर नहीं माना। सरकार का कहना है कि सभी डेटा सिस्टम में दर्ज हैं और रिपोर्ट के पुनर्निर्माण में कोई समस्या नहीं आएगी।

जयप्रकाश हेगड़े की स्वीकारोक्ति से मचा राजनीतिक बवाल
पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष के. जयप्रकाश हेगड़े ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि मूल डेटा का पता नहीं लगाया जा सका, जिसके चलते संशोधित रिपोर्ट नमूना-आधारित पद्धति पर आधारित है। उन्होंने इसे “एकमात्र व्यवहार्य विकल्प” बताया।

विपक्ष का हमला: बिना मूल रिपोर्ट के निर्णय कैसे?
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष आर. अशोक ने तीखा सवाल उठाया कि बिना मूल आधार के कोई भी नीतिगत निर्णय कैसे लिया जा सकता है। उन्होंने पूरी प्रक्रिया को “रहस्यपूर्ण और अपारदर्शी” बताया और इसे राज्य की जनता के साथ अन्याय करार दिया।

रिपोर्ट पर दस्तखत नहीं, कंथाराजू ‘गायब’
आर. अशोक ने यह भी दावा किया कि आयोग के पूर्व अध्यक्ष एच. कंथाराजू ने न तो रिपोर्ट पर दस्तखत किए और न ही बाद में नजर आए। हेगड़े द्वारा सरकार को लिखे एक पत्र में यह स्पष्ट किया गया कि उपलब्ध प्रतियां बिना हस्ताक्षर के थीं और मूल खाका लापता था।

जेडीएस का आरोप: वोट बैंक की राजनीति
जेडी (एस) ने आरोप लगाया कि संशोधित रिपोर्ट को केवल विशेष वोट बैंक को खुश करने के लिए तैयार किया गया है। पार्टी ने मांग की कि रिपोर्ट को आगे बढ़ाने से पहले सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि मूल रिपोर्ट कहाँ गई।

पृष्ठभूमि: कैसे शुरू हुआ था यह सर्वेक्षण?
कांग्रेस सरकार ने 2015 में मुख्यमंत्री सिद्धरमैया के पहले कार्यकाल में इस सर्वेक्षण की शुरुआत की थी। 2018 में सर्वेक्षण पूरा हुआ, और 2024 में हेगड़े के नेतृत्व में संशोधित रिपोर्ट पेश की गई।

सीलबंद बक्से, गायब ब्लूप्रिंट और लापरवाही का आरोप
सोशल मीडिया पर वायरल हुए हेगड़े के पत्र में कहा गया है कि 2021 में सीलबंद बक्से खोले गए, जिनमें मुद्रित प्रतियां थीं लेकिन न हस्ताक्षर थे न ही ब्लूप्रिंट। पत्र में संबंधित अधिकारी से जवाब मांगा गया, जिसने बताया कि दस्तावेज़ गायब हैं।

अब तक नहीं हुई जांच, 160 करोड़ का खर्च अधर में
हालांकि इस पूरे मामले की जांच की मांग की गई है, लेकिन 160 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद सरकार ने न तो एफआईआर दर्ज की और न ही किसी जांच की शुरुआत की है।

कैबिनेट बैठक से भी नहीं निकला निष्कर्ष
रिपोर्ट पर हाल ही में हुई विशेष कैबिनेट बैठक भी बिना किसी ठोस निर्णय के समाप्त हो गई। अगली बैठक 2 मई को प्रस्तावित है।

सरकार की सफाई: वैज्ञानिक पद्धति से हुआ सर्वेक्षण
गृह मंत्री जी परमेश्वर ने रिपोर्ट का बचाव करते हुए कहा कि यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मान्य सांख्यिकीय तकनीकों पर आधारित है।

आंतरिक मतभेद और समुदायों का विरोध
सूत्रों के अनुसार कुछ मंत्रियों ने रिपोर्ट को ‘अवैज्ञानिक’ बताते हुए आपत्ति जताई है। वोक्कालिगा और वीरशैव-लिंगायत जैसे प्रमुख समुदायों ने भी इस रिपोर्ट को खारिज करने की मांग की है।

दलित और ओबीसी संगठन रिपोर्ट के पक्ष में
हालांकि विरोध के स्वर मुखर हैं, लेकिन दलित और ओबीसी समुदाय के नेता एवं संगठन रिपोर्ट के समर्थन में हैं और चाहते हैं कि इसे सार्वजनिक कर आगे की कार्रवाई की जाए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *