जगदीप धनखड़ के कार्यकाल (2022-24) के बाद भाजपा ने उपराष्ट्रपति पद के लिए सीपी राधाकृष्णन को उम्मीदवार बनाया है। धनखड़ जहां विपक्ष की नज़र में आक्रामक और टकराववादी माने गए, वहीं राधाकृष्णन को शांत, संयमित और समावेशी नेता के रूप में देखा जा रहा है। उनकी उम्मीदवारी की विपक्ष द्वारा भी सराहना की गई है।
उपराष्ट्रपति पद की संवैधानिक भूमिका
भारत का उपराष्ट्रपति राज्यसभा का सभापति होता है, और इस पद से अपेक्षा रहती है कि वह सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद का माध्यम बने। हाल के वर्षों में यह पद राजनीतिक टकराव का केंद्र भी रहा है। इसी संदर्भ में धनखड़ और राधाकृष्णन की कार्यशैली का अंतर महत्वपूर्ण है।
जगदीप धनखड़: आक्रामक और विवादास्पद छवि
धनखड़ पेशे से वकील और अनुभवी नेता रहे, लेकिन उनकी छवि टकराववादी रही। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहते हुए वे लगातार विवादों और ममता बनर्जी सरकार से टकराव में रहे। उपराष्ट्रपति बनने के बाद भी विपक्ष ने उन्हें “पक्षपाती” और “सत्ता पक्ष के प्रवक्ता” कहा।
सीपी राधाकृष्णन: संतुलित और संवादप्रिय नेता
राधाकृष्णन का कार्यकाल विवाद-मुक्त रहा। महाराष्ट्र और झारखंड के राज्यपाल रहते हुए तथा तेलंगाना और पुडुचेरी का अतिरिक्त प्रभार संभालते हुए उन्होंने संतुलित छवि बनाए रखी। वह संवादप्रिय, सहज और समावेशी नेता माने जाते हैं।
रणनीतिक चुनाव: जातीय समीकरण से दक्षिण भारत तक
धनखड़ की नियुक्ति 2022 में जाट समाज को साधने की रणनीति थी। वहीं राधाकृष्णन की उम्मीदवारी भाजपा की दक्षिण भारत में पैठ बनाने और ओबीसी नेतृत्व को आगे रखने की रणनीति को दर्शाती है।
सामाजिक संदेश: ओबीसी और आरएसएस पृष्ठभूमि से आने वाले राधाकृष्णन का चयन भाजपा की समावेशी राजनीति का संदेश देता है।
दक्षिण भारत में सम्मान: तमिलनाडु से उपराष्ट्रपति बनने से दक्षिण भारत के मतदाताओं को गर्व का अनुभव होगा।
हिंदू एकजुटता: डीएमके के “सनातन धर्म” विवाद पर राधाकृष्णन की संतुलित प्रतिक्रिया भाजपा को वैचारिक आधार मजबूत करने में मदद करती है।
तमिलनाडु में भाजपा की चुनावी रणनीति
राधाकृष्णन का चयन तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 को ध्यान में रखकर किया गया है। यह भाजपा को ओबीसी वोटरों, दक्षिण भारतीय अस्मिता और समावेशी राष्ट्रीय पहचान दिलाने का साधन बनेगा।
राधाकृष्णन का राजनीतिक सफर
16 वर्ष की उम्र से आरएसएस और जनसंघ से जुड़े।
1998 और 1999 में कोयंबटूर से लोकसभा चुनाव जीते।
2004-2007 तक भाजपा तमिलनाडु प्रदेश अध्यक्ष रहे और 93 दिनों में 19,000 किलोमीटर की रथयात्रा निकाली।
महाराष्ट्र, झारखंड, तेलंगाना और पुडुचेरी के राज्यपाल पद संभाले।
समर्थक उन्हें “तमिलनाडु का मोदी” कहते हैं।
सीपी राधाकृष्णन की उम्मीदवारी सिर्फ एक संवैधानिक पद भरना नहीं, बल्कि भाजपा की व्यापक चुनावी और सामाजिक रणनीति का हिस्सा है। उनका उपराष्ट्रपति बनना भाजपा के लिए तमिलनाडु और दक्षिण भारत की राजनीति में प्रवेश का “गेटवे” साबित हो सकता है।