संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से 13 अगस्त 2026 तक चलेगा। इस दौरान केंद्र सरकार पांच नए विधेयक पेश करने और दो लंबित विधेयकों को चर्चा एवं पारित कराने के लिए आगे बढ़ाने की तैयारी में है। प्रस्तावित विधेयकों का संबंध आयकर, सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या, जन्म-मृत्यु पंजीकरण, राष्ट्रीय सम्मान और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों से है।
इसके अतिरिक्त विदेशी चंदे के नियमन और उच्च शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव से जुड़े दो लंबित विधेयक भी सदन के एजेंडे में रह सकते हैं। ऐसे में मानसून सत्र सरकार की आर्थिक, न्यायिक, प्रशासनिक और शैक्षणिक प्राथमिकताओं की दिशा तय करने वाला माना जा रहा है।
आयकर कानून में बदलाव की तैयारी
सरकार आयकर (संशोधन) विधेयक, 2026 पेश कर सकती है। इस विधेयक के जरिए कर प्रशासन और आयकर कानून के कुछ प्रावधानों में बदलाव किए जाने की संभावना है।
प्रस्तावित संशोधनों का विस्तृत स्वरूप विधेयक के सदन में पेश होने के बाद ही स्पष्ट होगा। हालांकि, इसे कर व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने और करदाताओं से जुड़ी प्रक्रियाओं में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आयकर संशोधन विधेयक सरकार के मानसून सत्र के प्रमुख विधायी प्रस्तावों में शामिल है।
सुप्रीम कोर्ट में बढ़ेगी न्यायाधीशों की संख्या
सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 भी सरकार के प्रमुख प्रस्तावों में शामिल है। केंद्रीय मंत्रिमंडल इस विधेयक को संसद में पेश करने की मंजूरी दे चुका है।
विधेयक के माध्यम से प्रधान न्यायाधीश को छोड़कर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की अधिकतम संख्या 33 से बढ़ाकर 37 करने का प्रस्ताव है। इस प्रकार प्रधान न्यायाधीश सहित सुप्रीम कोर्ट की कुल स्वीकृत क्षमता 34 से बढ़कर 38 हो जाएगी।
सरकार का मानना है कि चार अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति से लंबित मामलों के निपटारे में तेजी आएगी और शीर्ष अदालत अधिक प्रभावी तरीके से काम कर सकेगी।
जन्म-मृत्यु के विलंबित पंजीकरण पर सख्ती
सरकार जन्म और मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 भी संसद में पेश कर सकती है। प्रस्तावित कानून के जरिए जन्म और मृत्यु के विलंबित पंजीकरण से जुड़े नियमों को अधिक सख्त बनाने की तैयारी है।
रिपोर्टों के अनुसार, यदि जन्म या मृत्यु की सूचना दो वर्ष से अधिक समय बाद दी जाती है, तो ऐसे मामलों में पंजीकरण के लिए प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश की आवश्यकता हो सकती है। मौजूदा व्यवस्था में कुछ मामलों को जिला मजिस्ट्रेट, उपमंडल मजिस्ट्रेट या कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अनुमति से पंजीकृत किया जा सकता है।
सरकार का उद्देश्य नागरिक रिकॉर्ड की विश्वसनीयता बढ़ाना और गलत दस्तावेजों के आधार पर होने वाले पंजीकरण को रोकना माना जा रहा है।
राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कानून में संशोधन
राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 को भी मानसून सत्र में पेश करने, चर्चा करने और पारित कराने के लिए सूचीबद्ध किया जा सकता है।
यह विधेयक राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971 में बदलाव करेगा। रिपोर्टों के मुताबिक, प्रस्तावित संशोधन के माध्यम से राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को भी वैधानिक सुरक्षा देने पर विचार किया जा रहा है।
इसके तहत वंदे मातरम् के अपमान या इसके गायन में जानबूझकर बाधा डालने को दंडनीय बनाने का प्रावधान किया जा सकता है। हालांकि, विधेयक का अंतिम स्वरूप संसद में पेश होने के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट होगा।
MSME क्षेत्र के लिए सुधारों की तैयारी
सरकार सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) विधेयक, 2026 भी पेश कर सकती है। यह प्रस्ताव देश के करोड़ों छोटे कारोबारियों और उद्यमों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
विधेयक के जरिए MSME क्षेत्र को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने, कारोबार से जुड़ी प्रक्रियाओं को सरल करने और वित्तीय सहायता की व्यवस्था को मजबूत करने के प्रयास किए जा सकते हैं।
छोटे उद्यमों को समय पर भुगतान, आसान ऋण, तकनीकी सहायता और बाजार तक बेहतर पहुंच जैसे विषय भी विधेयक से जुड़ी चर्चा के केंद्र में रह सकते हैं। हालांकि, इसके निश्चित प्रावधान विधेयक पेश होने के बाद सामने आएंगे।
विदेशी फंडिंग पर बढ़ सकती है निगरानी
मानसून सत्र में विदेशी योगदान विनियमन संशोधन विधेयक, 2026 पर भी चर्चा हो सकती है। यह विधेयक पहले ही लोकसभा में पेश किया जा चुका है और अब इसे विचार तथा पारित कराने के लिए आगे बढ़ाया जा सकता है।
प्रस्तावित कानून उन संस्थाओं के विदेशी धन और संपत्तियों के प्रबंधन की व्यवस्था करता है, जिनका FCRA पंजीकरण रद्द हो गया हो, जिन्होंने पंजीकरण वापस कर दिया हो या जिनके पंजीकरण का नवीनीकरण न हुआ हो।
इसके लिए एक निर्दिष्ट प्राधिकरण बनाने का प्रस्ताव है, जो ऐसी संपत्तियों की निगरानी और प्रबंधन करेगा। इस विधेयक पर सरकार और विपक्ष के बीच तीखी बहस होने की संभावना है।
उच्च शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव
विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025 भी मानसून सत्र के प्रमुख लंबित विधेयकों में शामिल है। इसे 15 दिसंबर 2025 को लोकसभा में पेश किया गया था और अगले दिन संयुक्त संसदीय समिति को भेज दिया गया था।
विधेयक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद के स्थान पर उच्च शिक्षा के लिए एक साझा नियामक व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव करता है।
इसके तहत विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान नामक शीर्ष आयोग बनाया जाएगा। इसके अधीन नियमन, मानक निर्धारण और मान्यता प्रदान करने के लिए तीन अलग-अलग परिषदें गठित होंगी। चिकित्सा और कानून जैसे कुछ व्यावसायिक पाठ्यक्रम प्रस्तावित व्यवस्था से बाहर रहेंगे।
विपक्ष की रणनीति पर भी रहेगी नजर
मानसून सत्र में केवल विधेयकों पर ही नहीं, बल्कि सरकार और विपक्ष के राजनीतिक टकराव पर भी नजर रहेगी। विदेशी फंडिंग, राष्ट्रीय सम्मान और उच्च शिक्षा के नियमन से जुड़े प्रस्तावों पर विपक्ष सरकार से विस्तृत जवाब मांग सकता है।
विपक्ष महंगाई, बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था और अन्य राष्ट्रीय मुद्दों को भी संसद में उठाने की तैयारी कर सकता है। ऐसे में सदन की कार्यवाही के दौरान हंगामा और तीखी बहस होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
क्यों महत्वपूर्ण है मानसून सत्र?
मानसून सत्र का विधायी एजेंडा सीधे आम नागरिकों, करदाताओं, विद्यार्थियों, शिक्षण संस्थानों, छोटे कारोबारियों और न्याय व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
इन विधेयकों पर संसद में होने वाली चर्चा से यह स्पष्ट होगा कि सरकार कर सुधार, न्यायिक क्षमता, नागरिक पंजीकरण, विदेशी फंडिंग, उच्च शिक्षा और MSME क्षेत्र को लेकर किस दिशा में आगे बढ़ना चाहती है। हालांकि, विधेयकों की सूची और उनके प्रावधानों में सत्र के दौरान बदलाव भी हो सकता है।