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भगवान का नृसिंह के रूप में अवतार

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नरसिंह नर + सिंह (“मानव-सिंह”) को पुराणों में भगवान विष्णु का चौथा अवतार माना गया है। जो आधे मानव एवं आधे सिंह के रूप में प्रकट होते हैं, जिनका सिर एवं धड तो मानव का था लेकिन चेहरा एवं पंजे सिंह की तरह थे वे भारत में, खासकर दक्षिण भारत में वैष्णव संप्रदाय के लोगों द्वारा एक देवता के रूप में पूजे जाते हैं जो विपत्ति के समय अपने भक्तों की रक्षा के लिए प्रकट होते हैं।

पौराणिक कथा के अनुसार, बहुत समय पहले एक ऋषि हुआ करते थे, जिनका नाम ऋषि कश्यप और उनकी पत्नी का नाम दिति था। ऋषि और उनकी पत्नी दिति को 2 पुत्र हुए, जिनमें से एक का नाम ‘हरिण्याक्ष’ और दूसरे का नाम हिरण्यकश्यप था। भगवान विष्णु ने हिरण्याक्ष से पृथ्वी की रक्षा के हेतु वराह रूप धारण कर उसका वध कर दिया था।

भगवान विष्णु के द्वारा अपने भाई के वध से दुखी और क्रोधित हिरण्यकश्यप ने भाई की मृत्यु का बदला लेने के लिए अजेय होने का संकल्प कर हजारों वर्षों तक घोर तप किया। हिरण्यकश्यप की तपस्या से खुश होकर ब्रह्माजी ने उसे वरदान दिया कि उसे न कोई घर में मार सके न बाहर, न अस्त्र से उसका बध होगा और न शस्त्र से, न वो दिन में मरेगा न रात में, न मनुष्य से मरे न पशु से, न आकाश में और न पृथ्वी में।

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ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त करके हिरण्यकश्यप अजेय हो गया, उसने इंद्र से युद्ध कर स्वर्ग पर अधिकार जमा लिया, साथ ही सभी लोकों पर उसका राज हो गया। हिरण्यकश्यप इतना अंहकारी हो गया कि उसने अपनी प्रजा से खुद को भगवान की तरह पूजने का आदेश दिया और आदेश न मानने वाला सजा का भागीदार होता था।

हिरण्यकश्यप के अत्याचार की कोई सीमा नहीं रही, उसने प्रभु भक्तों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया था। हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद था तो असुर, लेकिन वो अपने पिता से बिलकुल विपरीत था। प्रह्लाद भगवान विष्णु का भक्त था, ये बात उसके पिता को पसंद नहीं थी, जिसके चलते उसने कई बार अपने पुत्र का वध करने की कोशिश की, लेकिन विष्णु भक्त होने के कारण हिरण्यकश्यप प्रह्लाद का कुछ भी नहीं बिगाड़ पाया।

भक्त प्रह्लाद पर हिरण्यकश्यप के अत्याचार की जब सभी सीमाएं पार कर गईं, तब भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लिया। जैसे हिरण्यकश्यप को वरदान प्राप्त था, वैसे ही भगवान ने उसका वध किया। भगवान नरसिंह ने दिन और रात के बीच के वक्त में आधे मनुष्य और आधे शेर का रूप धारण कर नरसिंह अवतार लिया। भगवान नरसिंह ने खंभा फाड़कर अवतार लिया और हिरण्यकश्यप को मुख्य दरवाजे के बीच अपने पैर पर लिटा दिया, शेर जैसे तेज नाखुनों से पेट फाड़कर उसका वध कर दिया। इस प्रकार से उन्होंने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की। उन्होंने आर्शीवाद दिया कि जो भी भक्त वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को उनका व्रत रखेगा, वह सभी तरह के दुखों से दूर रहेगा।

नरसिंह जयंती के दिन भगवान विष्णु के अवतार नरसिंह की पूजा करने से व्यक्ति को अभय की प्राप्ति होती है।
नरसिंहदेव, के बारे में कई तरह की प्रार्थनाएँ की जाती हैं जिनमे कुछ प्रमुख ये हैं:

नरसिंह मंत्र ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ॥
(हे क्रुद्ध एवं शूर-वीर महाविष्णु, तुम्हारी ज्वाला एवं ताप चतुर्दिक फैली हुई है। हे नरसिंहदेव, तुम्हारा चेहरा सर्वव्यापी है, तुम मृत्यु के भी यम हो और मैं तुम्हारे समक्ष आत्मसमर्पण करता हूँ।)

बिहार राज्य के पूर्णिया जिला के बनमनखी में सिकलीगढ़ धरहरा गांव हैं। बताया जाता है कि इसी गांव में भगवान नरसिंह अवतरित हुए थे और यही वो गांव है जहां भक्त प्रह्लाद की बुआ होलिका अपने भतीजे को गोद में लेकर आग में बैठी थी। मान्यता के मुताबिक यहीं से होलिकादहन की परंपरा की शुरुआत हुई थी।

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