वामन अवतार की कथा त्रेता युग से जुड़ी है। उस समय दैत्यराज बलि ने अपनी तपस्या और पराक्रम से तीनों लोक—स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल पर अधिकार जमा लिया था।
बलि पराक्रमी और धर्मनिष्ठ राजा थे, लेकिन स्वर्गलोक पर दैत्यों का आधिपत्य देवताओं के लिए असहनीय था।
देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की और धर्म की पुनर्स्थापना हेतु विष्णु ने वामन अवतार लेने का निश्चय किया।
वामन का स्वरूप
भगवान विष्णु ने एक छोटे कद के ब्राह्मण बालक के रूप में जन्म लिया। वामन का रूप अत्यंत सौम्य और आकर्षक था—कमल जैसे नेत्र, पीतांबर वस्त्र, हाथों में कमंडल, दंड और छत्र।
उनका रूप भले ही साधारण था, लेकिन उनके भीतर अनंत शक्ति छिपी थी।
बलि का यज्ञ और वामन की भिक्षा
उस समय बलि एक भव्य यज्ञ का आयोजन कर रहे थे। उन्होंने प्रतिज्ञा ली थी कि किसी भी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाएँगे।
इसी अवसर पर वामन उनके दरबार में पहुँचे और भिक्षा स्वरूप केवल “तीन पग भूमि” माँग ली।
बलि को यह मांग बहुत छोटी लगी, किंतु उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया।
गुरु शुक्राचार्य की चेतावनी
बलि के गुरु शुक्राचार्य ने पहचान लिया कि वामन कोई साधारण ब्राह्मण नहीं बल्कि स्वयं भगवान विष्णु हैं।
उन्होंने बलि को चेतावनी दी कि यह भिक्षा उन्हें सब कुछ खो देगी।
लेकिन बलि ने अपनी प्रतिज्ञा निभाते हुए कहा—यदि भगवान स्वयं मुझसे मांगने आए हैं तो यह मेरा सौभाग्य है।
वामन का विराट रूप
जैसे ही बलि ने वचन दिया, वामन का रूप विराट हो गया।
पहले पग में उन्होंने पृथ्वी को नापा।
दूसरे पग में स्वर्गलोक को।
अब तीसरे पग के लिए कोई स्थान शेष नहीं रहा।
वामन ने बलि से पूछा—”तीसरा पग कहाँ रखूँ?”
बलि का समर्पण
बलि ने विनम्र होकर अपना सिर झुका दिया और कहा—”भगवान, अब केवल मेरा सिर ही शेष है, आप इसे स्वीकार करें।”
वामन ने अपना तीसरा पग बलि के सिर पर रख दिया और उन्हें पाताल लोक का राजा बना दिया।
बलि की भक्ति और विष्णु का वरदान
बलि की भक्ति और सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया।
बलि पाताल के राजा बने।
विष्णु स्वयं उनके द्वारपाल बने।
साथ ही बलि को यह वरदान भी मिला कि वे हर वर्ष पृथ्वी पर आकर अपनी प्रजा से मिल सकेंगे।
इसी घटना की स्मृति में केरल में ओणम पर्व मनाया जाता है।