एक अहम घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को पहली बार 2018 के ‘कॉमन कॉज’ फैसले के तहत तय कानूनी ढांचे के आधार पर पैसिव यूथेनेशिया (Passive Euthanasia) की अनुमति दी। इस ढांचे को 2023 में अपडेट भी किया गया था।
यह फैसला जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने सुनाया। इस निर्णय को भारत में सम्मान के साथ मरने के अधिकार (Right to Die with Dignity) से जुड़े कानून में एक बड़ा और अहम मोड़ माना जा रहा है।
13 साल से वेजिटेटिव स्टेट में थे हरीश राणा
यह आदेश 32 वर्षीय हरीश राणा के पिता की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया गया। हरीश राणा एक इमारत से गिरने के बाद पिछले 13 वर्षों से इर्रिवर्सिबल वेजिटेटिव स्टेट में थे, यानी उनकी हालत ऐसी थी जिसमें ठीक होने की कोई संभावना नहीं थी।
2018 की गाइडलाइंस को आगे बढ़ाता फैसला
आज का फैसला इसलिए भी ऐतिहासिक माना जा रहा है क्योंकि यह 2018 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई पैसिव यूथेनेशिया की गाइडलाइंस को और स्पष्ट करता है।
दरअसल, यह निर्णय उन मामलों में पैसिव यूथेनेशिया लागू करने के तरीके को साफ करता है, जहां मरीज की जिंदगी फीडिंग ट्यूब के जरिए चल रही हो। पहले के फैसले में इस स्थिति के बारे में स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं दिए गए थे।
हरीश राणा का मामला क्यों था अलग
हरीश राणा के मामले में मेडिकल विशेषज्ञों की राय थी कि उनकी हालत में सुधार संभव नहीं है। हालांकि उनकी जिंदगी मेडिकल ट्यूब से दिए जा रहे भोजन पर निर्भर थी, जो 2018 की गाइडलाइंस में सीधे तौर पर शामिल नहीं था।
2018 के फैसले में पैसिव यूथेनेशिया के तहत मुख्य रूप से वेंटिलेटर जैसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने की बात कही गई थी। इसी वजह से अस्पताल स्तर पर हरीश राणा के मामले में इस प्रक्रिया को लागू करने में कानूनी अड़चन आ रही थी।
माता-पिता को जाना पड़ा सुप्रीम कोर्ट
इसी कारण हरीश राणा के माता-पिता को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। उनकी याचिका आखिरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में हरीश राणा का अस्पताल में चल रहा मेडिकल ट्रीटमेंट हटाने की अनुमति दे दी। इस फैसले के साथ 32 वर्षीय हरीश राणा को सम्मान के साथ मृत्यु (Right to Die with Dignity) का अधिकार मिल गया।