पार्वती और महादेव का मिलन केवल दो आत्माओं का संगम नहीं था, बल्कि शिव और शक्ति के पुनर्मिलन से संपूर्ण ब्रह्मांड में संतुलन की स्थापना हुई। जब भगवान शिव बारात लेकर हिमालय पहुँचे, तो उनका उग्र तपस्वी रूप देखकर पार्वती की माता मैना देवी भयभीत हो गईं। जटाजूट, भस्म, सर्प और त्रिनेत्र धारण किए शिव उन्हें अपनी पुत्री के योग्य वर प्रतीत नहीं हुए। आशंकित होकर उन्होंने विवाह रोकने की चेतावनी तक दे दी।
भगवान शिव का सौम्य और तेजस्वी स्वरूप
मैना देवी की शंका दूर करने के लिए भगवान शिव ने अपने दिव्य तेज से स्वयं को सुंदर, सौम्य और तेजस्वी रूप में प्रकट किया। उनका आभामंडल सूर्य और चंद्रमा से भी अधिक उज्ज्वल था। यह दृश्य देखकर मैना देवी की आँखों से अश्रु बह निकले और उन्होंने अपनी भूल स्वीकार कर क्षमा माँगी। इसके बाद शिव-पार्वती का विवाह संपन्न हुआ और सभी देवताओं ने इस शुभ अवसर का उत्सव मनाया।
तारकासुर का आतंक और देवताओं की चिंता
विवाह के पश्चात सभी को उस दिव्य संतान की प्रतीक्षा थी, जो तारकासुर का वध कर संसार को भय से मुक्त करेगी। किंतु समय बीतता गया और संतान का कोई संकेत नहीं मिला। उधर तारकासुर का अत्याचार बढ़ता जा रहा था, जिससे देवता अत्यंत चिंतित हो उठे।
अग्निदेव और शिव के दिव्य तेज की कथा
देवताओं ने अग्निदेव को कैलाश भेजा। वहाँ उन्होंने शिव-पार्वती को एकांत में देखा और संकोचवश लौटने लगे। निजता भंग होने से शिव और पार्वती अलग हो गए, किंतु उसी क्षण शिव का दिव्य तेज पृथ्वी पर गिर पड़ा। यह तेज इतना प्रचंड था कि कोई भी साधारण शक्ति उसे धारण नहीं कर सकती थी।
अग्नि, जल और पृथ्वी से होकर शिव बीज की रक्षा
अग्निदेव ने कबूतर का रूप धारण कर उस तेज को संभालने का प्रयास किया, लेकिन वे भी जलने लगे। विवश होकर उन्होंने उसे कुटिला नदी में प्रवाहित कर दिया। नदी भी उस तेज को सहन न कर सकी और अंततः वह सरवन नामक वन में पहुँचा। इस प्रकार अग्नि, जल और पृथ्वी के माध्यम से शिव का बीज सुरक्षित रहा।
सरवन वन में कार्तिकेय का दिव्य अवतरण
मार्गशीर्ष मास की षष्ठी तिथि को सरवन वन में एक दिव्य बालक का जन्म हुआ। उसके तेज से संपूर्ण वन स्वर्णिम हो उठा। सूर्य के समान दीप्तिमान उस शिशु की आभा देखकर देवता भी चकित रह गए।
छह कृतिकाएँ और षडानन का रहस्य
शिशु के जन्म के समय छह कृतिकाएँ वहाँ पहुँचीं। वे बालक पर मोहित हो गईं और उसे अपना पुत्र मानकर स्तनपान कराना चाहने लगीं। तभी बालक के छह मुख प्रकट हो गए, जिससे सभी कृतिकाएँ उसे दूध पिला सकें। इसी कारण वह षडानन कहलाया। किसी ने उसे अग्निज, किसी ने शरवनपुत्र, तो किसी ने कार्तिकेय कहा।
पार्वती का मातृत्व और देवसेनापति की घोषणा
बाद में माता पार्वती वहाँ पहुँचीं और अपने पुत्र को गोद में लिया। उनके स्पर्श मात्र से बालक के छह मुख एक हो गए। आकाश आनंद से गूंज उठा। देवताओं ने प्रसन्न होकर कार्तिकेय को अपना सेनापति घोषित किया। उन्हें मयूर वाहन और मुर्गा ध्वज प्रदान किया गया।
धर्म और शक्ति का प्रतीक कार्तिकेय
बाल्यावस्था से युवावस्था में प्रवेश करते ही कार्तिकेय में अद्भुत साहस, तेज और धर्म का संचार हुआ। उन्होंने गर्जना करते हुए घोषणा की कि अब तारकासुर का अंत निश्चित है। इस प्रकार शिव–शक्ति के प्रेम से उत्पन्न यह पुत्र धर्म, शक्ति और न्याय का प्रतीक बनकर संसार की रक्षा के लिए अग्रसर हुआ।