काली जयंती हिंदू धर्म में माता काली के प्रति श्रद्धा और भक्ति का एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह माता काली के अवतरण या जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। माता काली शक्ति, साहस और बुराई के नाश की प्रतीक मानी जाती हैं। वे मां दुर्गा का उग्र रूप हैं, जो भक्तों को भय, अंधकार और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति दिलाती हैं।
काली जयंती 2025 की तिथि
काली जयंती हर साल श्रावण मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है।
कुछ पंचांगों के अनुसार, यह भाद्रपद मास में भी मनाई जाती है।
2025 में काली जयंती 15 अगस्त, शुक्रवार को मनाई जाएगी।
इस दिन माता काली के प्रति विशेष पूजा और भक्ति का आयोजन किया जाता है।
काली जयंती का धार्मिक महत्व
माता काली दस महाविद्याओं में प्रथम महाविद्या मानी जाती हैं।
वे समय, मृत्यु और अंधकार की प्रतीक हैं और बुराई का नाश करती हैं।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, उनका जन्म मां दुर्गा के क्रोध से हुआ था ताकि राक्षसों का संहार किया जा सके।
देवी भागवत पुराण और ब्रह्मनील तंत्र में उनके दो रूप बताए गए हैं –
दक्षिणा काली (काले रंग की)
सुंदरी काली (लाल रंग की)
यह पर्व भक्तों को आध्यात्मिक शक्ति, साहस और कठिनाइयों से लड़ने की प्रेरणा देता है।
स्त्री शक्ति और काली जयंती
काली जयंती केवल माता काली के जन्म का पर्व नहीं, बल्कि स्त्री शक्ति का उत्सव भी है।
माता काली अपने भक्तों को भय, रोग और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त करती हैं।
इस दिन पूजा करने से राहु-केतु और शनि की साढ़े साती जैसे दोषों के प्रभाव को कम करने की मान्यता है।
काली जयंती पूजन विधि
पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें।
स्वच्छ चौकी पर लाल या काला कपड़ा बिछाएं।
चौकी पर माता काली की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
माता को गुड़हल के फूल और बेलपत्र अर्पित करें।
पुष्प, अक्षत और सिंदूर चढ़ाएं।
काली चालीसा या विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें।
आरती करें और भोग लगाएं।
प्रसाद को परिवार और जरूरतमंदों में बांटें।
व्रत रखें और दान-पुण्य करें (भोजन, वस्त्र, आवश्यक वस्तुएं)।
पूजा स्थल ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में हो।
भक्त का मुख पश्चिम और माता की मूर्ति का मुख पूर्व दिशा में होना चाहिए।
पूजा के समय साफ आसन पर बैठें, सीधे जमीन पर न बैठें।