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क्रिटिकल मिनरल्स पर जयशंकर की वैश्विक रणनीति

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भारत और अमेरिका के बीच हाल में हुए व्यापार समझौते के बाद अब दोनों देश रणनीतिक संसाधनों, खासकर अति महत्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) के क्षेत्र में सहयोग को तेज़ करते दिख रहे हैं।
बदलती वैश्विक व्यवस्था में इन खनिजों को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने देशों को नई और भरोसेमंद साझेदारियां बनाने पर मजबूर कर दिया है।

भारत का स्पष्ट संकेत: नियम बनाने वालों में शामिल होने की तैयारी

भारत की सक्रिय भागीदारी यह दर्शाती है कि वह भविष्य की प्रौद्योगिकी, ऊर्जा और औद्योगिक ढांचे से जुड़े संसाधनों की दौड़ में केवल सहभागी नहीं, बल्कि नीति निर्धारक बनना चाहता है।
इस दिशा में भारत ने अब खुलकर अपनी भूमिका स्पष्ट कर दी है।

जयशंकर का दोटूक संदेश

वाशिंगटन में आयोजित मंत्रीस्तरीय बैठक में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने कहा कि कुछ गिने-चुने देशों में अति महत्वपूर्ण खनिजों का अत्यधिक केंद्रीकरण पूरी दुनिया की आर्थिक और तकनीकी सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है।
उन्होंने आपूर्ति श्रृंखलाओं को विविध और सुरक्षित बनाने के लिए सुनियोजित अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर जोर दिया।

55 देशों की मौजूदगी, खनिज बने सामरिक शक्ति

इस बैठक की मेजबानी अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने की, जिसमें 55 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
यह स्पष्ट संकेत है कि अति महत्वपूर्ण खनिज अब केवल औद्योगिक जरूरत नहीं, बल्कि वैश्विक सामरिक शक्ति का आधार बन चुके हैं।

भारत के ठोस कदम

जयशंकर ने बताया कि भारत ने

राष्ट्रीय अति महत्वपूर्ण खनिज मिशन शुरू किया है,

दुर्लभ मृदा तत्व गलियारों के विकास पर काम हो रहा है,

और जिम्मेदार एवं पारदर्शी खनिज व्यापार को बढ़ावा दिया जा रहा है।

भारत ने खनिज आपूर्ति सहयोग से जुड़ी एक बहुपक्षीय पहल का भी समर्थन किया, जिसका उद्देश्य खोज, खनन और प्रसंस्करण में साझेदारी बढ़ाना है।

भारत–अमेरिका द्विपक्षीय सहयोग पर सहमति

वाशिंगटन दौरे के दौरान जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से अलग मुलाकात की।
दोनों देशों ने खनिज खोज, खनन और प्रसंस्करण में द्विपक्षीय सहयोग को औपचारिक रूप देने पर चर्चा की।

रणनीतिक साझेदारी को नई रफ्तार

दोनों पक्षों ने व्यापार, ऊर्जा, परमाणु, रक्षा, अति महत्वपूर्ण खनिज और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई।
इसके लिए विभिन्न संस्थागत तंत्रों की शीघ्र बैठक कराने पर भी सहमति बनी।

ट्रंप–मोदी ट्रेड डील का स्वागत

अमेरिकी पक्ष ने बताया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुए व्यापार समझौते का दोनों मंत्रियों ने स्वागत किया।
इस समझौते से पारस्परिक शुल्क में कमी का रास्ता खुला है, जिससे द्विपक्षीय व्यापार और निवेश को बल मिलने की उम्मीद है।

चार मंचों के ज़रिये सहयोग बढ़ाने का फैसला

बैठक के अंत में भारत और अमेरिका ने चार मंचों के माध्यम से द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत करने की प्रतिबद्धता दोहराई।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र को समृद्ध और स्थिर बनाए रखना साझा प्राथमिकता बताया गया।

बहुआयामी खनिज कूटनीति की ओर भारत

जयशंकर ने कनाडा, सिंगापुर, नीदरलैंड, इटली, मलेशिया, बहरीन, मंगोलिया, पोलैंड, रोमानिया, इज़राइल और उज्बेकिस्तान के अपने समकक्षों से भी बातचीत की।
यह दर्शाता है कि भारत अपनी खनिज कूटनीति को वैश्विक स्तर पर विस्तार दे रहा है।

क्यों अहम हैं अति महत्वपूर्ण खनिज

लिथियम, कोबाल्ट और दुर्लभ मृदा तत्व स्वच्छ ऊर्जा, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा प्रणालियों की रीढ़ हैं।
इन पर नियंत्रण का मतलब है भविष्य की अर्थव्यवस्था और सामरिक क्षमता पर पकड़।

नई सदी की सामरिक शतरंज

खनिजों की इस दौड़ को केवल व्यापार के चश्मे से देखना भूल होगी।
यह दरअसल नई सदी की सामरिक शतरंज है, जहां जिसने आपूर्ति और प्रसंस्करण पर नियंत्रण किया, वही भविष्य की दिशा तय करेगा।

भारत की चुनौती और अवसर

भारत अब निर्भर उपभोक्ता की छवि से बाहर निकलकर निर्णायक भागीदार बनना चाहता है।
यदि वह समय रहते खोज, खनन, प्रसंस्करण और भंडारण का मजबूत ढांचा खड़ा कर लेता है, तो न केवल अपनी जरूरतें सुरक्षित करेगा, बल्कि मित्र देशों के लिए भरोसेमंद स्रोत भी बन सकता है।

संतुलित लेकिन दृढ़ नीति की जरूरत

हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं हैं—
पर्यावरण, स्थानीय समुदायों की चिंता, लागत और वैश्विक शक्ति संघर्ष।
भारत को आक्रामक लेकिन संतुलित नीति अपनानी होगी, जिसमें दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हों।

खनिज कूटनीति बनेगी शक्ति का आधार

अब यह स्पष्ट है कि अति महत्वपूर्ण खनिज केवल आर्थिक मुद्दा नहीं रहे, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन और कूटनीति के केंद्र में आ चुके हैं।
भारत–अमेरिका के बीच इस क्षेत्र में बढ़ता सहयोग आने वाले वर्षों में नई रणनीतिक धुरी बना सकता है, जिसका असर हिंद-प्रशांत से लेकर यूरोप और पश्चिम एशिया तक दिखेगा।

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