हाल ही में संपन्न क्वॉड समूह की बैठक के दौरान दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती आक्रामकता से निबटने के उपायों पर चर्चा की गई थी। क्वॉड देशों ने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग को प्रगाढ़ करने के कदमों पर भी विचार किया। अब भारत और वियतनाम ने दक्षिण चीन सागर के विषय पर आपस में जो सहमति बनाई है, उसके चलते ड्रैगन का परेशान होना स्वाभाविक है। वियतनाम के प्रधानमंत्री की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच अहम समझौते हुए हैं। कुछ महीनों पहले भारत के रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री ने वियतनाम की यात्रा की थी। दक्षिण चीन सागर में चीनी आक्रामकता से परेशान वियतनाम को साथ लेकर भारत चीन को कड़ा सबक सिखाना चाहता है।
भारत और वियतनाम ने अपनी रणनीतिक साझेदारी का विस्तार करने के लिए जिस कार्ययोजना को मंजूरी दी है, उसका बड़ा प्रभाव आने वाले समय में देखने को मिल सकता है। दोनों देशों ने रक्षा संबंधों को बढ़ाने और चीन की बढ़ती सैन्य ताकत के मद्देनजर दक्षिण चीन सागर में शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रयासों को दोगुना करने की प्रतिबद्धता जताई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके वियतनामी समकक्ष फाम मिन्ह चिन्ह के बीच हुई व्यापक वार्ता में दक्षिण चीन सागर और समग्र हिंद-प्रशांत क्षेत्र की स्थिति पर प्रमुखता से चर्चा हुई। मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि भारत विकास का समर्थन करता है, न कि विस्तारवाद का। उनकी इस टिप्पणी को चीन के विस्तारवादी व्यवहार की ओर परोक्ष संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
दोनों शीर्ष नेताओं के बीच बातचीत के दौरान यह भी निर्णय लिया गया कि भारत वियतनाम को 30 करोड़ अमेरिकी डॉलर की ऋण सुविधा प्रदान करेगा, ताकि मुख्य रूप से दक्षिण-पूर्वी एशियाई देश की समुद्री सुरक्षा को मजबूत किया जा सके। इसके साथ ही दोनों पक्षों ने 2024-2028 की अवधि के दौरान व्यापक रणनीतिक साझेदारी के कार्यान्वयन के लिए ‘कार्य योजना’ सहित कुल नौ समझौतों और दस्तावेजों को अंतिम रूप दिया।
मोदी और चिन्ह ने एक संयुक्त बयान में दक्षिण चीन सागर में शांति, स्थिरता, सुरक्षा और नौवहन एवं उड़ान की स्वतंत्रता बनाए रखने के महत्व की पुष्टि की, साथ ही धमकी या बल प्रयोग का सहारा लिए बिना यूएनसीएलओएस के अनुसार विवादों का शांतिपूर्ण समाधान करने का आह्वान किया। दक्षिण चीन सागर हाइड्रोकार्बन का एक बड़ा स्रोत है जिस पर संप्रभुता के चीन के व्यापक दावों को लेकर वैश्विक चिंताएं बढ़ रही हैं। इस पर वियतनाम, फिलीपीन और ब्रुनेई सहित क्षेत्र के कई देशों के जवाबी दावे हैं।
संयुक्त वक्तव्य के मुताबिक, ‘‘दोनों नेताओं ने दावेदारों और अन्य सभी देशों द्वारा सभी गतिविधियों के संचालन में गैर-सैन्यीकरण और आत्म-संयम के महत्व को रेखांकित किया, तथा ऐसी कार्रवाइयों से बचने पर जोर दिया, जो स्थिति को और जटिल बना सकती हैं।’’ बयान में कहा गया कि मोदी और चिन्ह ने इस बात पर जोर दिया कि यूएनसीएलओएस समुद्री अधिकारों, संप्रभुता, क्षेत्राधिकार और समुद्री क्षेत्रों पर वैध हितों के निर्धारण का आधार है। दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने सीमा पार आतंकवाद सहित सभी रूपों और अभिव्यक्तियों में आतंकवाद की स्पष्ट रूप से निंदा भी की। वियतनाम ने माई सन यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के जीर्णोद्धार और संरक्षण के लिए भारत की प्रतिबद्धता तथा ए, एच और के. ब्लॉक में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा किए गए कार्यों के साथ-साथ एफ ब्लॉक में आगामी परियोजना की सराहना की।
वियतनाम एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था है। इसके अलावा वह एक कम्युनिस्ट देश है। वियतनाम परिधानों का प्रमुख निर्यातक है और उसकी अमेरिका तथा अन्य पश्चिमी देशों के साथ महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदारी है। वियतनाम भारत का बढ़ता रक्षा साझेदार भी है। वियतनाम की विदेश नीति को विशेषज्ञ बैम्बू पॉलिसी कहते हैं। जैसे बांस जरूरत पड़ने पर इधर-उधर झुक जाता है मगर उखड़ता नहीं वैसे ही वियतनाम की विदेश नीति जरूरत पड़ने पर लचीला रुख अपनाती है।
पिछले वर्ष वियतनाम के केंद्रीय रक्षा मंत्री भारत आए थे। उस समय भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और वियतनाम के केंद्रीय रक्षा मंत्री जनरल फान वान जियांग के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता के बाद घोषणा की गई थी कि भारत वियतनाम की नौसेना को स्वदेश निर्मित मिसाइल युद्धपोत आईएनएस कृपाण उपहार स्वरूप देगा। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि स्वदेश निर्मित मिसाइल युद्धपोत आईएनएस कृपाण को उपहार में देना वियतनाम की नौसेना की क्षमताओं के बढ़ाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के मजबूत स्थिति में होने के चलते भारत ने वियतनाम की नौसेना की ताकत बढ़ाने का जो फैसला किया था वह रणनीतिक रूप से काफी महत्व रखता है।
जुलाई 2007 में वियतनाम के तत्कालीन प्रधानमंत्री गुयेन तान दुंग की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच संबंधों का स्तर ‘रणनीतिक साझेदारी’ के स्तर पर पहुंच गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2016 में हुई वियतनाम की यात्रा के दौरान द्विपक्षीय संबंध उन्नत होकर ‘समग्र रणनीतिक साझेदारी’ के स्तर पर पहुंच गये थे।
वियतनाम, आसियान (दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों का संगठन) का एक महत्वपूर्ण देश है, जिसका दक्षिण चीन सागर क्षेत्र में चीन के साथ क्षेत्रीय विवाद है। दक्षिण चीन सागर में वियतनाम के जल क्षेत्र में भारत की तेल खोज परियोजनाएं हैं। साझा हितों की रक्षा के लिए पिछले कुछ वर्षों में भारत और वियतनाम अपने समुद्री सुरक्षा सहयोग को बढ़ा रहे हैं। भारत और वियतनाम एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी भी साझा करते हैं। दरअसल, द्विपक्षीय रक्षा संबंध इस साझेदारी का एक महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा संबंधों में विभिन्न प्रकार की साझेदारी हैं जिनमें सेवाएं, सैन्य-से-सैन्य आदान-प्रदान, उच्च-स्तरीय यात्राएं, क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण कार्यक्रम, संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना में सहयोग, जहाज यात्राएं और द्विपक्षीय अभ्यास शामिल हैं।
जून 2022 में भारतीय रक्षा मंत्री की वियतनाम यात्रा के दौरान, ‘2030 की ओर भारत-वियतनाम रक्षा साझेदारी पर महत्वपूर्ण व्यापक मार्गदर्शक दस्तावेजों, ‘संयुक्त दृष्टिकोण बयान’ और एक समझौता ज्ञापन ‘म्युचुअल लॉजिस्टिक्स सपोर्ट’ पर हस्ताक्षर किए गए थे जिसके कारण दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग के दायरे और पैमाने में काफी वृद्धि हुई है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की वियतनाम यात्रा के दौरान भारत और वियतनाम ने संबंधों को नई ऊँचाई प्रदान करते हुए जिस महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किये थे, उसकी बदौलत दोनों देशों की सेना एक-दूसरे के प्रतिष्ठानों का इस्तेमाल मरम्मत कार्य के लिए तथा आपूर्ति संबंधी कार्य के लिए कर पा रही हैं। खास बात यह है कि यह पहला ऐसा बड़ा समझौता था, जो वियतनाम ने किसी देश के साथ किया था।
दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती आक्रामकता के बीच भारत और वियतनाम के रिश्ते प्रगाढ़ होना पूरे क्षेत्र के हित में है क्योंकि चीन लगभग पूरे विवादित दक्षिण चीन सागर पर अपना दावा करता है, हालांकि ताइवान, फिलीपीन, ब्रूनेई, मलेशिया और वियतनाम इसके हिस्सों पर अपना दावा करते हैं। बीजिंग ने दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम द्वीप और सैन्य प्रतिष्ठान बनाए हैं। दक्षिण के अलावा चीन का पूर्वी चीन सागर में जापान के साथ भी क्षेत्रीय विवाद चल रहा है।
वियतनाम के खिलाफ चीनी हरकतों की बात करें तो एक रिपोर्ट से खुलासा हुआ था कि चीन की सरकार की ओर से प्रायोजित हैकर्स दक्षिणपूर्व एशिया में सरकार और निजी क्षेत्र के संगठनों को व्यापक रूप से निशाना बना रहे हैं, इनमें बुनियादी ढांचे के विकास की परियोजनाओं पर बीजिंग के साथ करीबी रूप से संलिप्त संगठन भी शामिल हैं। ‘रिकॉर्डेड फ्यूचर’ के चेतावनी अनुसंधान मंडल ‘इन्सिक्ट ग्रुप’ के अनुसार, हैकर्स के खास निशाने पर थाईलैंड का प्रधानमंत्री कार्यालय और सेना, इंडोनेशिया और फिलीपीन की नौसेनाएं, वियतनाम की नेशनल असेंबली और उसकी कम्युनिस्ट पार्टी का केंद्रीय कार्यालय तथा मलेशिया का रक्षा मंत्रालय रहते हैं। एक और समूह ‘इन्सिक्ट ग्रुप’ के खुलासे में भी बताया गया था कि मलेशिया, इंडोनेशिया और वियतनाम शीर्ष तीन देश हैं जो साइबर हमलों के निशाने पर रहते हैं।
चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए भारत और वियतनाम के बीच आपसी सहयोग को मजबूती मिलने से दक्षिण चीन सागर में सुरक्षा की स्थिति में सुधार आने की उम्मीद की जा सकती है।