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ज्ञान गंगा: रामचरितमानस भाग-18 में क्या हुआ?

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श्लोक:“श्री रामचन्द्राय नमः: पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं…”
जो श्रीराम का चरित्र है, वह पवित्र है, पापों को हरने वाला, कल्याणकारी और भक्ति-विज्ञान प्रदान करने वाला है। यह माया, मोह और मल का नाश करता है और प्रेमरस की धारा है।

मानस की रचना और उद्देश्य

दोहा:“जस मानस जेहि बिधि भयउ, जग प्रचार जेहि हेतु…”
तुलसीदास कहते हैं कि अब वे उस प्रसंग का वर्णन करते हैं कि यह रामचरितमानस कैसे बना और किस कारण इसका जग में प्रचार हुआ।

शिव कृपा से रचना

चौपाई:“संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी, रामचरितमानस कबि तुलसी…”
शिवजी की कृपा से तुलसीदास के हृदय में सुमति उत्पन्न हुई, जिससे उन्होंने रामचरितमानस की रचना की।

मानस की कल्पना – एक पवित्र सरोवर

ज्ञान-भक्ति का जल

“सुमति भूमि थल हृदय अगाधू, बेद पुरान उदधि घन साधू…”
मानस को एक सुंदर सरोवर की तरह प्रस्तुत किया गया है, जिसमें ज्ञान, भक्ति, प्रेम और सद्गुणों की वर्षा होती है।

कथा की विशेषताएँ

सात कांड = सरोवर की सात सीढ़ियाँ

चार संवाद = चार सुंदर घाट

राम-सीता यश = अमृतजल

चौपाइयाँ = कमलिनियाँ

उपमाएँ और भाषा = मकरंद, पराग

छंद/दोहा = बहुरंगे कमल

भौंरे और हंस = सत्कर्म और वैराग्य

मानस का आध्यात्मिक पर्यावरण

जलचर और पक्षी

ज्ञान-वैराग्य = हंस

काव्यगुण = सुंदर मछलियाँ

रामगुण गान = जलबिहग (पक्षी)

संत-संग = चारों ओर की अमराई

भक्ति का रूप

“भगति निरूपन बिबिध बिधाना, छमा दया दम लता बिताना…”
भक्ति-वृक्ष में क्षमा, दया और संयम की लताएँ हैं। यम-नियम इसके फूल और फल हैं, और श्रीहरि चरणों की रति उसका सार है।

कथा का रोमांच

“पुलक बाटिका बाग बन सुख, सुबिहंग बिहारु…”
इस कथा में आने वाला भाव-प्रवाह, रोमांच और हर्ष ही इस मानस वाटिका के पक्षी और आनंद हैं। निर्मल मन उस वाटिका का माली है।

रामचरितमानस केवल एक ग्रंथ नहीं, अपितु एक दिव्य सरोवर है – जिसमें श्रद्धा, प्रेम, भक्ति और ज्ञान की धाराएँ निरंतर बहती हैं। यह साधकों और भक्तों को जीवन की शांति और मोक्ष प्रदान करता है।

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