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Ganga Dussehra: गंगा दशहरा पर स्नान-दान का धार्मिक महत्व क्या है?

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हिंदू धर्म में गंगा दशहरा अत्यंत पवित्र पर्व माना जाता है। यह ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन मां गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं। इस अवसर पर श्रद्धालु गंगा स्नान, पूजा-अर्चना और दान करके विशेष पुण्य प्राप्त करते हैं।

शास्त्रों के अनुसार, गंगा दशहरा पर गंगा में स्नान करने से दस प्रकार के पापों का नाश होता है, इसलिए इसे “दशहरा” कहा जाता है। इस दिन नदियों, तालाबों या घर में गंगा जल मिलाकर स्नान करने का भी विशेष महत्व बताया गया है। इसे आत्मा की शुद्धि और पितरों के उद्धार का माध्यम माना जाता है।

गंगा अवतरण की पौराणिक कथा

राजा सगर और अश्वमेध यज्ञ

पौराणिक कथाओं के अनुसार, गंगा दशहरा का संबंध राजा भगीरथ की कठोर तपस्या और मां गंगा के पृथ्वी पर अवतरण से जुड़ा हुआ है। सूर्यवंश के महान राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया था। यज्ञ के घोड़े की रक्षा की जिम्मेदारी उनके पुत्रों को सौंपी गई थी।

देवराज इंद्र ने यज्ञ में विघ्न डालने के लिए उस घोड़े को कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया।

सगर पुत्रों का विनाश

राजा सगर के साठ हजार पुत्र घोड़े की खोज करते हुए पाताल लोक पहुंचे। वहां उन्होंने कपिल मुनि को ध्यानमग्न अवस्था में देखा और घोड़े को उनके आश्रम में बंधा पाकर उन्हें चोर समझ लिया। क्रोधित होकर उन्होंने मुनि का अपमान कर दिया।

कपिल मुनि के क्रोध से सभी सगर पुत्र वहीं भस्म हो गए।

भगीरथ की कठोर तपस्या

जब राजा सगर को यह समाचार मिला तो वे अत्यंत दुखी हुए। उनके पौत्र अंशुमान ने कपिल मुनि से क्षमा मांगी और पूर्वजों के उद्धार का उपाय पूछा। मुनि ने बताया कि केवल स्वर्ग की गंगा ही उनके पितरों को मोक्ष दिला सकती हैं।

अंशुमान और उनके पुत्र दिलीप ने गंगा को पृथ्वी पर लाने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। इसके बाद दिलीप के पुत्र भगीरथ ने कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने गंगा को पृथ्वी पर भेजने का वरदान दिया।

शिव जी ने संभाला गंगा का वेग

ब्रह्मा जी ने कहा कि गंगा के प्रचंड वेग को संभालने के लिए किसी शक्तिशाली देवता की आवश्यकता होगी। तब भगीरथ ने भगवान शिव की आराधना की। शिव जी प्रसन्न हुए और गंगा को अपनी जटाओं में धारण करने के लिए तैयार हो गए।

ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन मां गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुईं। शिव जी की जटाओं से निकलकर उन्होंने सगर पुत्रों की राख को स्पर्श किया और उन्हें मोक्ष प्रदान किया। तभी से गंगा दशहरा पर्व मनाया जाता है।

गंगा दशहरा पर स्नान का महत्व

दस पापों से मिलती है मुक्ति

वराह पुराण के अनुसार, ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को हस्त नक्षत्र में गंगा का अवतरण हुआ था। इस दिन स्नान करने से शारीरिक, मानसिक और वाचिक दस प्रकार के पाप नष्ट होते हैं।

स्नान की विशेष विधि

गंगा दशहरा पर ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करना शुभ माना जाता है। श्रद्धालु गंगा तट पर जाकर मां गंगा का स्मरण करते हैं और दस बार डुबकी लगाते हैं। यदि गंगा नदी तक पहुंचना संभव न हो, तो घर पर गंगा जल मिलाकर स्नान किया जा सकता है।

स्नान के दौरान गंगा स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत फलदायी माना गया है। स्नान के बाद तर्पण, पिंडदान और दीपदान करने का भी विशेष महत्व है।

गंगा दशहरा पर दान का महत्व

दस प्रकार के दान का विधान

गंगा दशहरा पर दान-पुण्य को विशेष फलदायी बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान दस गुना फल प्रदान करता है। इस अवसर पर अन्न, वस्त्र, फल, घी, दूध, छाता, जूते, आसन और स्वर्ण आदि का दान किया जाता है।

पितरों को मिलती है तृप्ति

शास्त्रों के अनुसार, गंगा दशहरा पर दान करने से पितरों को तृप्ति मिलती है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है। दान करते समय गंगा माता को स्मरण कर संकल्प लेना शुभ माना जाता है।

पूजा-अर्चना और व्रत का महत्व

मां गंगा की विशेष पूजा

गंगा दशहरा पर व्रत और पूजा का भी विशेष महत्व है। श्रद्धालु स्नान के बाद मां गंगा की विधिपूर्वक पूजा करते हैं। पूजा में श्वेत पुष्प, चंदन, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किया जाता है।

मंत्र जाप और भजन-कीर्तन

इस दिन गंगा स्तोत्र और गायत्री मंत्र का जाप करना शुभ माना जाता है। कई भक्त पूरे दिन उपवास रखते हैं और शाम को फलाहार करते हैं। मंदिरों और घाटों पर भजन-कीर्तन तथा गंगा आरती का आयोजन होता है, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है

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