NATIONAL THOUGHTS

A Web Portal Of Positive Journalism 

फैमिली लॉ: सास-ससुर के भरण-पोषण की जिम्मेदारी बहू पर नहीं – इलाहाबाद हाईकोर्ट

Share This Post

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि भारतीय न्याय सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144 के तहत बहू अपने सास-ससुर को गुजारा भत्ता देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है।

अदालत की टिप्पणी

न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने कहा कि गुजारा भत्ते का दावा एक सांविधिक अधिकार है, जो केवल उन व्यक्तियों तक सीमित है जिनका उल्लेख कानून में किया गया है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि सास-ससुर इस प्रावधान के दायरे में नहीं आते हैं।

साथ ही, कोर्ट ने यह भी कहा कि भले ही यह एक नैतिक जिम्मेदारी प्रतीत हो, लेकिन कानूनी प्रावधान के अभाव में इसे बाध्यकारी नहीं बनाया जा सकता।

याचिका खारिज

अदालत ने बुजुर्ग दंपति राकेश कुमार और उनकी पत्नी द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया।
यह फैसला 4 फरवरी को सुनाया गया, जिसमें कोर्ट ने कहा कि विधायिका ने जानबूझकर सास-ससुर को इस प्रावधान में शामिल नहीं किया है।

मामले की पृष्ठभूमि

बुजुर्ग दंपति ने आगरा की परिवार अदालत के अगस्त 2025 के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनके गुजारा भत्ता आवेदन को पहले ही खारिज कर दिया गया था।
उन्होंने दलील दी थी कि वे वृद्ध, अशिक्षित और आर्थिक रूप से कमजोर हैं तथा अपने दिवंगत बेटे पर पूरी तरह निर्भर थे।

 बहू के पक्ष में तर्क

दंपति का कहना था कि उनकी बहू, जो उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल है, अच्छी आय अर्जित करती है और उसने उनके बेटे के सेवानिवृत्ति लाभ भी प्राप्त किए हैं।
उन्होंने इसे बहू की नैतिक जिम्मेदारी बताते हुए कानूनी दायित्व बनाने की मांग की।

अदालत का निष्कर्ष

हालांकि, अदालत ने यह दलील भी खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जिससे यह साबित हो कि बहू को नौकरी अनुकंपा के आधार पर मिली थी।

इस प्रकार, अदालत ने साफ किया कि केवल नैतिक आधार पर किसी को कानूनी रूप से भरण-पोषण के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *