दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग द्वारा शुरू किए गए नए स्नातक पाठ्यक्रम ‘धर्मशास्त्र अध्ययन’ में मनुस्मृति को प्रमुख पठन सामग्री के रूप में शामिल करने पर विवाद खड़ा हो गया है। पाठ्यक्रम में वर्ण व्यवस्था, विवाह की सामाजिक भूमिका, नैतिकता और धर्म जैसे विषयों को पढ़ाने का प्रस्ताव था। हालांकि, विश्वविद्यालय प्रशासन ने अब स्पष्ट किया है कि मनुस्मृति किसी भी रूप में पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं बनेगी।
पाठ्यक्रम का उद्देश्य और संरचना
छात्रों को भारतीय दर्शन से जोड़ने का प्रयास
‘धर्मशास्त्र अध्ययन’ पाठ्यक्रम संस्कृत में दक्ष छात्रों के लिए तैयार किया गया है, जिसका उद्देश्य प्राचीन भारतीय समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था और न्याय व्यवस्था की समझ देना है। यह पाठ्यक्रम चार प्रमुख खंडों में विभाजित है:
धर्म की अवधारणा – रामायण, महाभारत, पुराण और कौटिल्य के अर्थशास्त्र के माध्यम से धर्म को सामाजिक और नैतिक तत्व के रूप में समझाया जाएगा।
आचार, व्यवहार और प्रायश्चित – वर्णाश्रम व्यवस्था, विवाह, शिक्षा, यज्ञ और दान जैसे विषय शामिल हैं।
व्यवहार और राजव्यवस्था – प्राचीन भारतीय शासन व्यवस्था, मंत्रिमंडल की योग्यता, मंडल सिद्धांत जैसे राजनीतिक विचारों पर आधारित है।
प्रायश्चित – तप, व्रत, तीर्थयात्रा और दान आदि पापों के निवारण के उपायों पर केंद्रित।
मनुस्मृति पर विश्वविद्यालय प्रशासन की सफाई
VC का सख्त निर्देश
जैसे ही पाठ्यक्रम में मनुस्मृति की उपस्थिति सामने आई, कुलपति योगेश सिंह ने स्पष्ट कर दिया कि “दिल्ली विश्वविद्यालय में मनुस्मृति किसी भी रूप में नहीं पढ़ाई जाएगी।” उन्होंने यह भी कहा कि इस निर्देश को पहले ही विभागों को दिया गया था और इसका उल्लंघन नहीं होना चाहिए था।
पूर्व में भी उठा था विवाद
मनुस्मृति पर पहले भी विरोध
यह पहली बार नहीं है जब मनुस्मृति को लेकर विवाद हुआ है। जुलाई 2023 में भी इतिहास (ऑनर्स) पाठ्यक्रम में इसे शामिल करने के प्रस्ताव को भारी विरोध के बाद वापस ले लिया गया था। उस समय भी प्रशासन ने कहा था कि समाज को विभाजित करने वाली सामग्री को पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं बनाया जाएगा।
पाठ्यक्रम प्रक्रिया पर उठे सवाल
विविध विचारों की जरूरत
मनुस्मृति को फिर से पाठ्यक्रम में शामिल करने के प्रयास ने पाठ्यक्रम निर्माण प्रक्रिया की पारदर्शिता और अकादमिक ज़िम्मेदारी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कई शिक्षाविद और छात्र इस बात की मांग कर रहे हैं कि विश्वविद्यालय की अकादमिक समितियों में विविध दृष्टिकोणों का समावेश होना चाहिए।
मनुस्मृति: बहस और विमर्श का केंद्र
प्राचीन ग्रंथ और आधुनिक सामाजिक चिंतन
मनुस्मृति जैसे ग्रंथों को लेकर अकादमिक जगत में लंबे समय से बहस जारी है। एक ओर इन्हें प्राचीन सामाजिक ढांचे की झलक माना जाता है, वहीं दूसरी ओर इन पर वर्ण और लिंग भेदभाव को बढ़ावा देने का आरोप भी लगता रहा है। दिल्ली विश्वविद्यालय की हालिया स्थिति यह संकेत देती है कि ऐसे ग्रंथों को शामिल करने से पहले उनके सामाजिक प्रभाव और समावेशिता पर गहन विचार जरूरी है।