जम्मू-कश्मीर में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के बीच मतभेद अब सार्वजनिक रूप से सामने आ चुके हैं। ताजा विवाद एलजी कार्यालय द्वारा 48 जेकेएएस (Jammu and Kashmir Administrative Services) अधिकारियों के तबादले को लेकर है, जो कथित रूप से राज्य की निर्वाचित सरकार से बिना परामर्श के किया गया।
बिना परामर्श तबादले पर नाराजगी
सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला इस एकतरफा निर्णय से खासे नाराज हैं। उन्होंने इस मुद्दे को गृह मंत्रालय तक पहुंचाते हुए एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने मध्यम और निचले स्तर के अधिकारियों के तबादलों को लेकर चिंता जताई है। उमर का कहना है कि यह निर्णय निर्वाचित सरकार की भूमिका और अधिकारों को दरकिनार करने जैसा है।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया को दरकिनार करने का आरोप
सत्तारूढ़ गठबंधन—जिसमें नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी), कांग्रेस और निर्दलीय विधायक शामिल हैं—का आरोप है कि उपराज्यपाल मनोज सिन्हा लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का उल्लंघन कर रहे हैं। गठबंधन का कहना है कि आईएएस अधिकारियों के तबादले पर एलजी को अधिकार है, लेकिन जेकेएएस अधिकारियों के मामलों में हस्तक्षेप करना निर्वाचित सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है।
आपात बैठक में दो अहम प्रस्ताव
शुक्रवार को श्रीनगर में उमर अब्दुल्ला की अध्यक्षता में एक आपातकालीन बैठक आयोजित की गई, जिसमें डॉ. फारूक अब्दुल्ला समेत कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए। बैठक में दो प्रस्ताव पारित किए गए:
हाल ही में संसद में पारित वक्फ विधेयक की कड़ी निंदा।
केंद्र सरकार से जम्मू-कश्मीर की जनता के जनादेश का सम्मान करने की अपील।
एलजी सिन्हा की सफाई
इस पूरे विवाद पर उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “मैंने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के दायरे में रहते हुए ही कार्य किया है। मैं कभी भी अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर नहीं गया।”
शक्तियों के विभाजन पर भी टकराव
उमर अब्दुल्ला की सरकार पहले ही एक प्रस्ताव केंद्र को भेज चुकी है, जिसमें निर्वाचित सरकार और उपराज्यपाल के बीच अधिकारों के स्पष्ट विभाजन के लिए नए नियम सुझाए गए हैं। इन नियमों का उद्देश्य एलजी के अत्यधिक हस्तक्षेप को सीमित करना है, लेकिन अभी तक केंद्र सरकार ने इन्हें स्वीकृति नहीं दी है।