बंबई हाईकोर्ट ने माकपा (CPI-M) द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें मुंबई पुलिस द्वारा गाज़ा में हो रही मौतों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन की अनुमति न देने के फैसले को चुनौती दी गई थी। अदालत की सख्त टिप्पणियां उन सभी के लिए नजीर बन गई हैं जो भारत में बार-बार अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर सार्वजनिक प्रदर्शन करते हैं।
पहले भारत के मुद्दों पर ध्यान दें: हाईकोर्ट
सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ताओं से कहा, “देशभक्त बनिए… अपने देश के मुद्दों पर बोलिए। हमारे देश में कचरा, अवैध पार्किंग, बाढ़ और जल निकासी जैसी अनेक समस्याएं हैं। हजारों मील दूर क्या हो रहा है, उससे आपके मुवक्किल कैसे प्रभावित हो रहे हैं?”
यह टिप्पणी अदालत के उस दृष्टिकोण को दर्शाती है कि भारत के नागरिकों और दलों को अपनी प्राथमिकताएं स्पष्ट रखनी चाहिए।
याचिका खारिज करने का कानूनी आधार
CPI(M) की याचिका इस आधार पर खारिज की गई कि प्रदर्शन की अनुमति के लिए आवेदन उसने नहीं बल्कि ऑल इंडिया पीस एंड सॉलिडेरिटी फाउंडेशन (AIPSF) ने दिया था। न्यायमूर्ति आर.वी. घुगे और न्यायमूर्ति गौतम अंकद की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता को कानूनी रूप से याचिका दायर करने का अधिकार नहीं था।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम राष्ट्रीय हित
सीनियर अधिवक्ता मिहिर देसाई ने तर्क दिया कि गाज़ा पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार है। उन्होंने कहा, “क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता केवल भारत के मुद्दों तक सीमित है?” लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि भारत की वर्तमान समस्याओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
कानून-व्यवस्था और कूटनीतिक संवेदनशीलता पर चिंता
अतिरिक्त लोक अभियोजक श्रीकांत गावंड ने कहा कि ऐसे प्रदर्शनों से कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है और यह भारत की आधिकारिक कूटनीतिक स्थिति के विपरीत जा सकता है। अदालत ने भी संकेत दिया कि अंतरराष्ट्रीय विवादों पर प्रदर्शन से संवेदनशील हालात पैदा हो सकते हैं।
यह फैसला बना राजनीतिक दलों और कार्यकर्ताओं के लिए संदेश
यह निर्णय केवल एक कानूनी आदेश नहीं बल्कि एक सामाजिक और राजनीतिक संदेश भी है। अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि नागरिक अधिकारों की रक्षा ज़रूरी है, लेकिन राष्ट्रीय हित और अंतरराष्ट्रीय संतुलन भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। जो लोग गाज़ा या अन्य अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर बार-बार प्रदर्शन करते हैं, उनके लिए यह फैसला एक स्पष्ट नजीर है।