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BMC मेयर पर BJP-सेना में तकरार, बाल ठाकरे की विरासत पर संकट?

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देश की सबसे अमीर महानगरपालिका बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) में चार साल की देरी के बाद चुनाव तो संपन्न हो गए, लेकिन असली राजनीतिक ड्रामा अब शुरू हुआ है।
मुंबई का अगला मेयर कौन होगा, इसे लेकर महायुति गठबंधन (BJP–शिंदे शिवसेना) के भीतर खींचतान सड़क से लेकर कैबिनेट बैठकों तक पहुंच गई है। यह लड़ाई सिर्फ एक पद की नहीं, बल्कि शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे की राजनीतिक विरासत पर दावे की भी है।

रोटेशन फॉर्मूला बना विवाद की जड़

विवाद की मुख्य वजह शिंदे गुट की यह मांग है कि मेयर पद रोटेशन के आधार पर दिया जाए।
शिंदे शिवसेना चाहती है कि पांच साल के कार्यकाल में पहले ढाई साल तक मेयर पद उनके पास रहे।
यह सिर्फ सत्ता का सवाल नहीं है, बल्कि यह एकनाथ शिंदे के राजनीतिक अस्तित्व और प्रभाव से भी जुड़ा हुआ है, जिन्हें बड़े राजनीतिक विभाजन के बाद मुख्यमंत्री से उपमुख्यमंत्री बनना पड़ा था।

2026 और बाल ठाकरे की जन्म शताब्दी का संदर्भ

इस पूरे विवाद के केंद्र में साल 2026 है, जो दिवंगत बाल ठाकरे की जन्म शताब्दी वर्ष होगा।
बाल ठाकरे का सपना था कि महाराष्ट्र की सत्ता के हर पायदान पर शिवसैनिक हों —
चाहे वह वर्षा बंगला (मुख्यमंत्री आवास) हो या मुंबई की मेयर की कुर्सी।

शिंदे की दलील: श्रद्धांजलि और अस्तित्व की लड़ाई

शिंदे गुट का तर्क है कि बाल ठाकरे के 100वें जन्म वर्ष में अगर एक शिवसैनिक मेयर बनता है, तो यही उनकी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

मेयर पद मिलने से शिंदे गुट खुद को उद्धव ठाकरे के मुकाबले “असली शिवसेना” साबित कर सकेगा।

यह पद शिंदे के लिए राजनीतिक रूप से प्रतिष्ठा और पुनर्स्थापन का माध्यम भी बनेगा।

BMC पर शिवसेना का ऐतिहासिक दबदबा

बाल ठाकरे के नेतृत्व में और उनके निधन के बाद भी कई वर्षों तक शिवसेना का BMC पर दबदबा रहा।
लगभग तीन दशकों तक शिवसेना का मेयर रहा।

1995–1999 के बीच मनोहर जोशी और नारायण राणे के मुख्यमंत्री रहते हुए
शिवसेना का मुख्यमंत्री और शिवसेना का मेयर एक साथ थे।

इसके बाद यह स्थिति दोबारा कभी नहीं बन पाई।

आज शिंदे शिवसेना और उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT), दोनों ही उस विरासत पर दावा कर रहे हैं।

BMC चुनाव नतीजे और गठबंधन की गणित

227 सदस्यों वाली BMC में महायुति गठबंधन को बहुमत मिला है।

BJP: 89 सीटें

शिंदे शिवसेना: 29 सीटें

कुल महायुति: 118 सीटें (बहुमत का आंकड़ा 114)

वहीं, विपक्षी शिवसेना (UBT) को 65 सीटें मिलीं और वह दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी।
बहुमत के बावजूद अब तक BMC के संचालन के लिए कोई अंतिम व्यवस्था नहीं बन पाई है।

रजिस्ट्रेशन रद्द कर बढ़ाया सस्पेंस

महायुति में दरार तब खुलकर सामने आई जब शिंदे शिवसेना ने अचानक
BMC के लिए अपने 29 पार्षदों का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया।

कई पार्षदों को अंतिम समय तक इसकी जानकारी नहीं दी गई।

माना जा रहा है कि शिंदे गुट पावर-शेयरिंग से असंतुष्ट था।

शिंदे का सियासी संदेश और कैबिनेट बहिष्कार

तनाव और बढ़ा जब डिप्टी CM एकनाथ शिंदे ने:

एक अहम कैबिनेट बैठक

और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से प्रस्तावित मुलाकात

दोनों को छोड़ दिया।
इसके बजाय वे अपने पैतृक गांव डेयर (सतारा) चले गए।
उनके गुट के कई मंत्रियों ने भी बैठक का बहिष्कार किया।

BJP का संतुलन साधने का प्रयास

सूत्रों के मुताबिक, BJP शिंदे शिवसेना को
ठाणे नगर निगम का नियंत्रण देने के लिए तैयार है,
ताकि BMC मेयर और इंप्रूवमेंट्स कमेटी पर सहमति बन सके।

कल्याण-डोंबिवली और उल्हासनगर में BJP बराबर की पावर-शेयरिंग चाहती है।

जॉइंट ग्रुप और इंप्रूवमेंट्स कमेटी का दांव

खबरें हैं कि BJP और शिंदे शिवसेना
BMC में जॉइंट ग्रुप के रूप में रजिस्टर कर सकते हैं।

इंप्रूवमेंट्स कमेटी:

सड़क निर्माण

इन्फ्रास्ट्रक्चर

बड़े शहरी प्रोजेक्ट्स

पर नियंत्रण रखती है, इसलिए यह सबसे ताकतवर समिति मानी जाती है।

जुबानी जंग भी तेज

BJP नेता और मंत्री गणेश नाइक के बयान ने विवाद को और हवा दी।
उन्होंने ठाणे में कहा कि
“अगर BJP नेतृत्व इजाज़त दे, तो किसी का राजनीतिक अस्तित्व खत्म हो सकता है।”

हालांकि BJP शीर्ष नेतृत्व ने संयम बरतते हुए कहा कि
गठबंधन में बातचीत जारी है और जल्द समाधान निकलेगा।

UBT का हमला और दिल्ली कनेक्शन का आरोप

शिवसेना (UBT) नेताओं ने शिंदे गुट पर BJP के सामने झुकने का आरोप लगाया।

संजय राउत ने कहा कि मेयर का फैसला दिल्ली में हो रहा है।

उन्होंने इसे मुंबई और बाल ठाकरे की विरासत का अपमान बताया।

क्यों अहम है BMC मेयर की कुर्सी

BMC मेयर पद:

उच्च राजनीतिक दृश्यता

बड़े बजट और परियोजनाओं पर असर

मुंबई में मराठी पहचान का प्रतीक

शिंदे के लिए यह पद
राजनीतिक पुनरुत्थान और ताकत की वापसी का जरिया बन सकता है।

फैसला क्या गठबंधन जोड़ेगा या तोड़ेगा?

जैसे-जैसे मेयर चुनाव नज़दीक आ रहा है,
यह साफ है कि यह फैसला या तो महायुति को मजबूत करेगा
या उसमें और गहरी दरारें पैदा करेगा।

एक बात तय है—
14 साल बाद भी बाल ठाकरे की विरासत
मुंबई और महाराष्ट्र की राजनीति की धुरी बनी हुई है।

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