पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भद्रा सूर्यदेव और उनकी पत्नी छाया की पुत्री थीं और शनिदेव की बहन थीं। उनका स्वभाव कठोर और क्रोधी था। कुछ ग्रंथों में उनका वर्णन काले वर्ण, बड़े दांतों, लंबे बालों और गधे के मुख वाली त्रिपाद कन्या के रूप में किया गया है। उनका जन्म राक्षसों के विनाश के लिए हुआ था, लेकिन उनकी उद्दंडता देवताओं और मनुष्यों के लिए संकट बन गई।
भद्रा की उत्पत्ति कैसे हुई?
भद्रा का जन्म होते ही उन्होंने यज्ञ, पूजा और शुभ कार्यों में विघ्न डालना शुरू कर दिया। परेशान होकर सूर्यदेव ने ब्रह्मा जी से सहायता मांगी। ब्रह्मा जी ने भद्रा को पंचांग के विष्टि करण में स्थान दिया और निर्देश दिया कि जो भी व्यक्ति तुम्हारे समय में शुभ कार्य करे, तुम उसमें बाधा डालना।
भद्रा काल क्या है?
पंचांग के अनुसार, भद्रा विष्टि करण का भाग होती है और यह समय अशुभ माना जाता है। यह पंचांग के पाँच अंगों में से एक ‘करण’ का एक प्रकार है। भद्रा तीनों लोकों—स्वर्ग, पाताल और पृथ्वी में भ्रमण करती है, और उसका प्रभाव चंद्र राशि के अनुसार बदलता रहता है।
भद्रा का लोक अनुसार प्रभाव
भूलोक (पृथ्वी): जब चंद्रमा कर्क, सिंह, कुंभ या मीन में हो—सबसे अशुभ समय।
स्वर्गलोक: जब चंद्रमा मेष, वृषभ, मिथुन या वृश्चिक में हो—शुभ माना जाता है।
पाताल लोक: जब चंद्रमा कन्या, तुला, धनु या मकर में हो—भी शुभ प्रभाव देता है।
भद्रा के अंगों का फल
मुख नीचे: कार्यों का नाश
कंठ नीचे: धन हानि
हृदय नीचे: प्राण संकट
पूंछ नीचे: कार्यों में सफलता
नोट: भद्रा की अंतिम 3 घटी (लगभग 72 मिनट) को ‘पुच्छ काल’ कहते हैं और इसे शुभ माना जाता है।
भद्रा काल में शुभ कार्य क्यों वर्जित हैं?
भद्रा काल में राक्षसी शक्तियाँ सक्रिय मानी जाती हैं।
कथा अनुसार, शूर्पणखा ने रावण को भद्रा काल में राखी बांधी थी, जिससे उनका कुल नष्ट हुआ।
द्रौपदी ने भी इसी काल में भाई को राखी बांधी थी और उसके बाद कष्टों का सिलसिला शुरू हुआ।
इस समय भगवान शिव तांडव मुद्रा में होते हैं, इसलिए शुभ कार्य वर्जित हैं।
भद्रा काल में क्या कर सकते हैं?
हालांकि भद्रा काल में शुभ कार्यों की मनाही होती है, लेकिन कुछ कार्य इस समय किए जा सकते हैं:
तांत्रिक पूजा, सिद्धि साधना
शत्रु परास्त करने वाले कार्य
मुकदमे या कानूनी लड़ाई
राजनीतिक निर्णय
वाहन क्रय (कुछ ग्रंथों के अनुसार)