महाभारत के अनुसार, अश्वत्थामा का नाम महान योद्धाओं की नहीं, बल्कि शापित योद्धाओं की सूची में दर्ज है। इसका मुख्य कारण वह घोर पाप है, जिसने उसे वीरता की नहीं, बल्कि कायरता और अमानवीयता की श्रेणी में खड़ा कर दिया। युद्ध के मैदान से बाहर किया गया उसका अपराध उसे कभी महान बनने नहीं देता।
द्रौपदी के पाँचों पुत्रों की नृशंस हत्या के कारण स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को श्राप दिया था। उसे कलियुग के अंत तक भटकने का दंड मिला। इसी कारण यह मान्यता है कि अश्वत्थामा आज भी अपने घावों के साथ जंगलों में भटक रहा है।
गुरु द्रोणाचार्य की मृत्यु से टूटा अश्वत्थामा
गुरु द्रोणाचार्य की मृत्यु धोखे से हुई थी। द्रोणाचार्य दिव्य अस्त्रों के महान ज्ञाता और अपराजेय योद्धा थे। उन्हें सीधे युद्ध में हराना कठिन था। इसलिए श्रीकृष्ण की रणनीति के अनुसार पांडवों ने एक योजना बनाई।
भीम ने युद्ध के मैदान में अश्वत्थामा नाम के हाथी को मारकर ऊँचे स्वर में कहा—
“अश्वत्थामा मारा गया!”
यह सुनकर गुरु द्रोणाचार्य शोक से टूट गए और उन्होंने हथियार डाल दिए। इसी अवसर का लाभ उठाकर धृष्टद्युम्न ने पीछे से उनका वध कर दिया। यह समाचार जब अश्वत्थामा तक पहुँचा, तो वह बदले की आग में जल उठा।
बदले की आग और नारायणास्त्र का प्रयोग
पिता की मृत्यु से क्रोधित अश्वत्थामा ने पांडव वंश के विनाश की कसम खाई। उसने पांडव सेना पर नारायणास्त्र चलाया, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से सभी योद्धा बच गए।
इसके बाद भी अश्वत्थामा का क्रोध शांत नहीं हुआ। उसने एक और घिनौनी योजना बनाई।
द्रौपदी के पाँचों पुत्रों की निर्मम हत्या
रात के समय अश्वत्थामा पांडवों के शिविर में घुसा। उस समय द्रौपदी के पाँचों पुत्र शिविर में सो रहे थे।
निहत्थे और सोते हुए बच्चों की हत्या कर अश्वत्थामा ने ऐसा पाप किया जिसे महाभारत का सबसे अमानवीय कृत्य माना जाता है।
कुछ कथाओं में यह भी कहा गया है कि अश्वत्थामा जानता था कि वे पांडवों के पुत्र नहीं, बल्कि द्रौपदी के बेटे हैं—फिर भी उसने उन्हें मार डाला।
ब्रह्मास्त्र और अजन्मे शिशु पर हमला
जब श्रीकृष्ण और पांडवों को इस अपराध का पता चला, तो अर्जुन ने क्रोध में ब्रह्मास्त्र चलाने का निश्चय किया। श्रीकृष्ण ने उसे रोका, लेकिन अश्वत्थामा ने अपनी जान बचाने के लिए ब्रह्मास्त्र चला दिया।
सबसे भयावह बात यह थी कि उसने उस ब्रह्मास्त्र को उत्तरा के गर्भ में पल रहे अजन्मे शिशु की ओर मोड़ दिया।
श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति से उस मृत शिशु को पुनः जीवित कर दिया।
भगवान श्रीकृष्ण का अश्वत्थामा को श्राप
अश्वत्थामा के बढ़ते अत्याचार को रोकना आवश्यक हो गया था।
भगवान श्रीकृष्ण ने उसके माथे से दिव्य मणि छीन ली, जिससे उसकी शक्ति समाप्त हो गई।
इसके बाद श्रीकृष्ण ने उसे भयंकर श्राप दिया—“तुम कलियुग के अंत तक मृत्यु से वंचित रहोगे।तुम मनुष्यों के बीच रहने योग्य नहीं हो।तुम्हारा शरीर घावों से भरा और दुर्गंधयुक्त रहेगा,और तुम युगों तक भटकते रहोगे।”
क्या अश्वत्थामा आज भी जीवित है?
महाभारत के अनुसार, अश्वत्थामा चिरंजीवी है। कई कथाओं में दावा किया गया है कि लोगों ने जंगलों में
लगभग 7 फुट लंबे, घावों से भरे एक व्यक्ति को भटकते देखा है, जिसके शरीर से खून रिसता है।
हालाँकि इन दावों की ऐतिहासिक पुष्टि नहीं होती, लेकिन महाभारत स्पष्ट रूप से कहता है कि
अश्वत्थामा को कलियुग के अंत तक भटकने का श्राप मिला था।