जो समुद्र मन्थन के समय क्षीरसागर से निकला था।
कालकूट एक प्रकार का अत्यंत भयंकर विष । विशेष—इसे काला बच्छनाग भी कहते हैं । इस विष को भगवान शंकर ने अपने कंठ में धारण किया था जो उनके कंठ में आज तक है।
“उड्भ्रिंगस्वानिकरोप्ताङ्ग खँग विडंग अङ्ग विभूषितः।प्रचष्टधात्वादि सारँग धरो ललाटे प्रलिप्त रोषधानी च।”
अर्थात भाँग, धतूरा, विल्वपत्र, तुलसीपत्र, चन्दन, अभिरंग, वडालिक, सरप्ता, अलाकापत्र एवं भष्म का लेप कर भगवान शिव को शांत किया। तब भगवान शिव के नेत्र शांत एवं प्रसन्न मुद्रा में खिल उठे। उनका विष का आतप कम हुआ। और फिर सामान्य अवस्था को प्राप्त हुए। और तभी से भगवान शिव ने यह वरदान दिया कि जो मुझे इस प्रकार इन वानस्पतिक औषधियों से पूजित कर प्रसन्न करेगा उसे इच्छित वर प्राप्त होगा। तभी से भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा में भाँग, धतूरा आदि चढ़ाया जाता है।उस कालकूट विष के प्रभाव से शिव जी का कण्ठ नीला पड़ गया। इसीलिये महादेव जी को नीलकण्ठ कहते हैं। उनकी हथेली से थोड़ा सा विष पृथ्वी पर टपक गया था जिसे नाग , बिच्छू आदि विषैले जन्तुओं ने ग्रहण कर लिया। समुद्र मंथन दैत्यों के बीच एक प्रकार का प्रस्ताव रखा था । जो दोनों के लिए लाभदायक था । कहा जाता है कि भगवान शिव ने इस स्थान पर साठ हजार वर्षों तक समाधिस्थ रहकर विष की ऊष्णता को शांत किया था। कालांतर में यही स्थान पौड़ी जनपद के यमकेश्वर विकासखंड में श्री नीलकंठ महादेव के नाम से विख्यात है। स्कंदपुराण, केदारखंड और शिवपुराण आदि धर्मग्रंथों में इसका उल्लेख है।समुद्र मन्थन एक प्रसिद्ध हिन्दू धर्मपौराणिक कथा है। यह कथा भागवत पुराण, महाभारत तथा विष्णु पुराण में आती है।
एक प्रचलित श्लोक के अनुसार चौदह रत्न निम्नवत हैं:
लक्ष्मीः कौस्तुभपारिजातकसुराधन्वन्तरिश्
गावः कामदुहा सुरेश्वरगजो रम्भादिदेवांगनाः।
अश्वः सप्तमुखो विषं हरिधनुः शंखोमृतं चाम्बुधेः।
रत्नानीह चतुर्दश प्रतिदिनं कुर्यात्सदा मंगलम्।
कथा
श्री शुकदेव जी बोले, “हे राजन्! राजा बलि के राज्य में दैत्य, राक्षस तथा दानव अति प्रबल हो उठे थे। उन्हें शुक्राचार्य की शक्ति प्राप्त थी। इसी बीच दुर्वासा ऋषि के शाप से देवराज इन्द्र शक्तिहीन हो गये थे। असुरराज बलि का राज्य तीनों लोकों पर था। इन्द्र सहित देवतागण उससे भयभीत रहते थे। इस स्थिति के निवारण का उपाय केवल बैकुण्ठनाथ विष्णु ही बता सकते थे, अतः ब्रह्मा जी के साथ समस्त देवता भगवान नारायण के पास पहुचे। उनकी स्तुति करके उन्होंने भगवान विष्णु को अपनी विपदा सुनाई। तब भगवान मधुर वाणी में बोले कि इस समय तुम लोगों के लिये संकट काल है। दैत्यों, राक्षसों एवं दानवों का अभ्युत्थान हो रहा है और तुम लोगों की अवनति हो रही है। किन्तु संकट काल को मैत्रीपूर्ण भाव से व्यतीत कर देना चाहिये। तुम असुरों से मित्रता कर लो और क्षीर सागर को मथ कर उसमें से अमृत निकाल कर पान कर लो। असुरों की सहायता से यह कार्य सुगमता से हो जायेगा। इस कार्य के लिये उनकी हर शर्त मान लो और अन्त में अपना काम निकाल लो। अमृत पीकर तुम अमर हो जाओगे और तुममें असुरों को मारने का सामर्थ्य आ जायेगा।
“भगवान के आदेशानुसार इन्द्र ने समुद्र मंथन से अमृत निकलने की बात बलि को बताया। असुरराज बलि ने देवराज इन्द्र से समझौता कर लिया और समुद्र मंथन के लिये तैयार हो गये। मन्दराचल पर्वत को मथनी तथा वासुकी नाग को नेती बनाया गया। वासुकी के नेत्र से नेतङ(राजपुरोहित) का उद्भव हुआ। स्वयं भगवान श्री विष्णु कच्छप अवतार लेकर मन्दराचल पर्वत को अपने पीठ पर रखकर उसका आधार बन गये। भगवान नारायण ने असुर रूप से असुरों में और देवता रूप से देवताओं में शक्ति का संचार किया। वासुकीनाग को भी गहन निद्रा दे कर उसके कष्ट को हर लिया। देवता वासुकी नाग को मुख की ओर से पकड़ने लगे। इस पर उल्टी बुद्धि वाले दैत्य, राक्षस, दानवादि ने सोचा कि वासुकी नाग को मुख की ओर से पकड़ने में अवश्य कुछ न कुछ लाभ होगा। उन्होंने देवताओं से कहा कि हम किसी से शक्ति में कम नहीं हैं, हम मुँह की ओर का स्थान लेंगे। तब देवताओं ने वासुकी नाग के पूँछ की ओर का स्थान ले लिया।
“समुद्र मंथन आरम्भ हुआ और भगवान कच्छप के एक लाख योजन चौड़ी पीठ पर मन्दराचल पर्वत घूमने लगा। हे राजन! समुद्र मंथन से सबसे पहले जल का हलाहल विष निकला। उस विष की ज्वाला से सभी देवता तथा असुर जलने लगे और उनकी कान्ति फीकी पड़ने लगी। इस पर सभी ने मिलकर भगवान शंकर की प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना पर महादेव जी उस विष को हथेली पर रख कर उसे पी गये किन्तु उसे कण्ठ से नीचे नहीं उतरने दिया। उस कालकूट विष के प्रभाव से शिव जी का कण्ठ नीला पड़ गया। इसीलिये महादेव जी को नीलकण्ठ कहते हैं। उनकी हथेली से थोड़ा सा विष पृथ्वी पर टपक गया था जिसे नाग , बिच्छू आदि विषैले जन्तुओं ने ग्रहण कर लिया।
“विष को शंकर भगवान के द्वारा पान कर लेने के पश्चात् फिर से समुद्र मंथन प्रारम्भ हुआ। दूसरा रत्न कामधेनु गाय निकली जिसे ऋषियों ने रख लिया। फिर उच्चैःश्रवा घोड़ा निकला जिसे असुरराज बलि ने रख लिया। उसके बाद ऐरावत हाथी निकला जिसे देवराज इन्द्र ने ग्रहण किया। ऐरावत के पश्चात् कौस्तुभमणि समुद्र से निकली उसे विष्णु भगवान ने रख लिया। फिर कल्पवृक्ष निकला और रम्भा नामक अप्सरा निकली। इन दोनों को देवलोक में रख लिया गया। आगे फिर समु्द्र को मथने से महलक्ष्मी जी निकलीं। महालक्ष्मी जी ने स्वयं ही भगवान विष्णु को वर लिया। उसके बाद कन्या के रूप में वारुणी प्रकट हई जिसे असुरों ने ग्रहण किया। फिर एक के पश्चात एक चन्द्रमा, पारिजात वृक्ष तथा शंख निकले और अन्त में धन्वन्तरि वैद्य अमृत का घट लेकर प्रकट हुये।” धन्वन्तरि के हाथ से अमृत को असुरों ने छीन लिया और उसके लिये आपस में ही लड़ने लगे। देवताओं के पास दुर्वासा के शापवश इतनी शक्ति रही नहीं थी कि वे असुरों से लड़कर उस अमृत को ले सकें इसलिये वे निराश खड़े हुये उनका आपस में लड़ना देखते रहे। देवताओं की निराशा को देखकर भगवान