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दिल्ली में कृत्रिम बारिश नाकाम, प्रदूषण से राहत नहीं

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दिल्ली में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए 53 वर्षों के अंतराल के बाद मंगलवार को कृत्रिम वर्षा (क्लाउड सीडिंग) का परीक्षण किया गया। सरकार को उम्मीद थी कि इस प्रयोग से आसमान से राहत की बूंदें गिरेंगी और जहरीली हवा साफ़ होगी, लेकिन नतीजा उम्मीदों के विपरीत रहा — राजधानी में एक भी बूँद नहीं गिरी।

मौसम विभाग (IMD) ने पुष्टि की कि दिल्ली में बारिश के कोई संकेत दर्ज नहीं हुए। हालांकि, सरकार ने दावा किया कि जिन इलाकों में यह प्रयोग हुआ — बुराड़ी, करोल बाग, मयूर विहार और बादली — वहाँ पीएम 2.5 और पीएम 10 के स्तर में हल्की गिरावट आई।

कैसे हुआ कृत्रिम वर्षा का परीक्षण

दिल्ली सरकार ने IIT कानपुर के सहयोग से यह परीक्षण किया। विमान से **सिल्वर आयोडाइड और सोडियम क्लोराइड** के मिश्रण का छिड़काव किया गया ताकि बादलों में नमी के कण बनें और वर्षा हो सके।

* पहला परीक्षण दोपहर दो बजे तक चला।
* दूसरा परीक्षण शाम करीब चार बजे मेरठ-खेकड़ा-बुराड़ी गलियारे में किया गया।
* कुल **आठ झोंकों** में रसायनों का छिड़काव हुआ।

परंतु, आर्द्रता केवल 15–20% होने के कारण परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं थीं। वैज्ञानिकों के अनुसार, कृत्रिम बारिश के लिए कम से कम 60% आर्द्रता आवश्यक होती है।

सरकार का दावा बनाम ज़मीनी हकीकत

सरकार ने दावा किया कि **नोएडा और ग्रेटर नोएडा में हल्की बूंदाबांदी (0.1–0.2 मिमी)** दर्ज की गई, लेकिन दिल्ली के अधिकांश हिस्सों में एक भी बूंद नहीं पड़ी।
आईआईटी कानपुर की रिपोर्ट में कहा गया कि

* मयूर विहार में पीएम 2.5 का स्तर 221 से घटकर 207 हुआ।
* करोल बाग में 230 से घटकर 206।
* बुराड़ी में 229 से घटकर 203।
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यह गिरावट नगण्य और अस्थायी है।

विपक्ष का तंज और पर्यावरणविदों की चेतावनी

आप और भाजपा ने इस प्रयोग पर एक-दूसरे पर निशाना साधा।

आप नेता सौरभ भारद्वाज** ने कहा, “भाजपा सरकार ने बारिश के नाम पर भी धोखाधड़ी की है।”
उन्होंने तंज कसा, “लगता है इंद्रदेव भी भाजपा से नाराज़ हैं।”

पर्यावरणविद विमलेंदु झा ने कहा, “कृत्रिम बारिश से कुछ समय के लिए प्रदूषण कम हो सकता है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं। इससे मिट्टी और जलस्रोतों पर रासायनिक असर भी पड़ सकता है।”

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 1970 के दशक में भी हुआ था प्रयोग

दिल्ली में पहली बार कृत्रिम वर्षा का परीक्षण **1957 में** मानसून के दौरान हुआ था।
दूसरा प्रयोग **1971-72 में** राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला परिसर में किया गया था, जहाँ सिल्वर आयोडाइड से नमी संघनित कर वर्षा की बूंदें बनाई गईं।

नतीजा: हवा अब भी जहरीली

परीक्षण के बाद वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) में मामूली सुधार दर्ज हुआ —

सोमवार को AQI था **301 (बेहद खराब)**
मंगलवार को घटकर **294 (खराब)**

परंतु दिल्ली की हवा अब भी सांस लेने लायक नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक वाहनों, निर्माण धूल और पराली जलाने पर नियंत्रण नहीं होगा, कृत्रिम बारिश जैसे प्रयोग केवल “राजनीतिक प्रदर्शन” ही रह जाएंगे।

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