इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की एक टिप्पणी सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गई है। उन्होंने कहा,
“किसी लड़की के स्तनों को पकड़ना, उसके पाजामे का नाड़ा तोड़ना और उसे पुलिया के नीचे खींचने का प्रयास करना बलात्कार या बलात्कार के प्रयास का आरोप लगाने के लिए पर्याप्त नहीं है।”
यह टिप्पणी उन्होंने धारा 376 (बलात्कार) और पॉक्सो अधिनियम की धारा 18 के तहत दर्ज एक मामले में आरोपियों को जमानत देते हुए की थी।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले का है, जहां पवन और आकाश नाम के दो युवकों पर एक नाबालिग लड़की से रेप के प्रयास का आरोप था। निचली अदालत ने दोनों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 और पॉक्सो एक्ट की धारा 18 के तहत मुकदमे के लिए तलब किया था।
हालांकि, आरोपियों ने हाई कोर्ट में अपील कर दावा किया कि उन पर रेप का मामला नहीं बनता, बल्कि यह धारा 354 और 354B के तहत आता है। हाई कोर्ट ने इस तर्क को सही मानते हुए गंभीर आरोपों में संशोधन का आदेश दिया।
केंद्रीय मंत्री और महिला नेताओं ने जताई नाराज़गी
इस फैसले पर केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री अन्नपूर्णा देवी ने कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने इसे गलत करार देते हुए सुप्रीम कोर्ट से इस पर संज्ञान लेने की अपील की।
तृणमूल कांग्रेस की सांसद जून मालिया ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी और कहा,
“देश में महिलाओं के प्रति इस तरह की उपेक्षा बेहद घृणित है, जिसे रोकने की जरूरत है।”
दिल्ली महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल ने कहा,
“यह बहुत शर्मनाक और दुर्भाग्यपूर्ण फैसला है। सुप्रीम कोर्ट को इस पर तुरंत दखल देना चाहिए।”
हाई कोर्ट का तर्क और आगे की राह
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह मामला ‘अपराध की तैयारी’ और ‘वास्तविक प्रयास’ के बीच का अंतर है, इसलिए इसे रेप की धारा में नहीं गिना जा सकता। हालांकि, इस फैसले के खिलाफ देशभर में नाराजगी देखी जा रही है, और सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की मांग जोर पकड़ रही है।