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पार्वती से कौशिकी और महाकाली प्रकट होने की रहस्यमयी कथा

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पार्वती पर्वतराज हिमालय की पुत्री थीं। विवाह के बाद वे शिव के साथ कैलाश पर्वत पर निवास करने लगीं। वे स्वयं प्रकृति का साक्षात स्वरूप थीं—सौंदर्य, शक्ति और करुणा का अद्भुत संगम।

“काली” संबोधन और पार्वती का संकल्प

एक दिन भगवान शिव ने स्नेहपूर्वक माता पार्वती को “काली” कहकर संबोधित किया और मुस्कुरा दिए। यह सुनकर माता पार्वती को पीड़ा हुई। उन्होंने जल में अपना प्रतिबिंब देखा और विचार किया कि वे तो अत्यंत तेजस्वी और सुंदर हैं, फिर उन्हें “काली” क्यों कहा गया?

यह संबोधन उनके हृदय को आहत कर गया। उन्होंने निश्चय किया कि वे ऐसा रूप धारण करेंगी कि शिव कभी उनका उपहास न कर सकें। यह संकल्प लेकर वे कैलाश छोड़ तपस्या के लिए प्रस्थान कर गईं।

ब्रह्माजी की तपस्या और गौरी रूप की प्राप्ति

माता पार्वती ने कठोर तप कर ब्रह्मा को प्रसन्न किया। ब्रह्माजी ने वरदान मांगने को कहा। पार्वती ने अपने सांवले रूप को त्यागकर गौरवर्ण प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की, ताकि उन्हें फिर “काली” न कहा जाए।

ब्रह्माजी ने समझाया कि प्रकृति के सभी रंग उनके ही स्वरूप हैं, किंतु पार्वती अपने संकल्प पर अडिग रहीं। तब ब्रह्माजी ने पवित्र जल का छिड़काव किया। उसी क्षण उनका सांवला अंश शरीर से अलग होने लगा और उनका स्वरूप अत्यंत उज्ज्वल व गौर हो गया। इस नवीन रूप को “गौरी” कहा गया।

कौशिकी का प्राकट्य

पार्वती के शरीर से जो सांवला अंश अलग हुआ, वह एक उग्र देवी के रूप में प्रकट हुआ—काली त्वचा, लाल नेत्र और अपार शक्ति से युक्त। चूंकि यह रूप पार्वती की कोशिकाओं से उत्पन्न हुआ था, इसलिए उसका नाम “कौशिकी” रखा गया।

यह वही शक्ति थी, जो आगे चलकर अधर्म और असुरों के विनाश हेतु प्रकट हुई।

महाकाली का रहस्य

जब माता गौरी पुनः कैलाश लौटीं, तब भगवान शिव ने सबसे पहले कौशिकी के विषय में पूछा। पार्वती आश्चर्यचकित रह गईं, क्योंकि यह नाम तो ब्रह्माजी ने दिया था।

तब शिव ने बताया कि उनका उद्देश्य पार्वती का उपहास करना नहीं था, बल्कि उनके भीतर निहित उस उग्र और दिव्य शक्ति को जागृत करना था। वही शक्ति आगे चलकर महाकाली के रूप में प्रकट हुई—जो अधर्म और असुरों का संहार करने वाली बनीं।

संतुलन का प्रतीक: गौरी और काली

माता पार्वती ने समझ लिया कि उनका प्रत्येक रूप—चाहे वह शांत और सौम्य गौरी हो या उग्र और शक्तिशाली काली—समान रूप से महत्वपूर्ण है।

भगवान शिव ने उन्हें बताया कि वे स्वयं सृष्टि का संतुलन हैं—
वे सृजन करती हैं, पालन करती हैं और आवश्यकता पड़ने पर संहार भी करती हैं।

अंततः इस घटना के बाद पार्वती और शिव के मध्य प्रेम, समझ और आध्यात्मिक एकता पहले से भी अधिक गहरी हो गई।

यह कथा हमें सिखाती है कि प्रकृति का हर रूप—मृदु हो या उग्र—सृष्टि के संतुलन के लिए अनिवार्य है।

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